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छत्रपति संभाजी महाराज (धर्मवीर स्वराज्य-रक्षक एवं मुग़ल-प्रतिरोध सम्पूर्ण इतिहास)

छत्रपति संभाजी महाराज (धर्मवीर स्वराज्य-रक्षक एवं मुग़ल-प्रतिरोध सम्पूर्ण इतिहास)

Chhatrapati Sambhaji Maharaj Comprehensive Historical Biography

कमल गोखले / ऐतिहासिक शोध मण्डल द्वारा

DevanagariHindipublished793 पृष्ठ

पृष्ठ 170, कुल 793 में से

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किले के ऊपर से निकल जाती थीं। संक्रान्ति से एक दिन पहले शम्भूराजा की महाराज से भेंट हुई थी। उसके बाद तीन-चार दिन तक उनकी चर्चाएँ निरन्तर होती रहीं। महाराज रायगढ़ की ओर निकल चुके थे। शम्भूराजा को शिवाजी महाराज के हृदय के अमृतघट से नयी ऊर्जा प्राप्त हुई थी। किन्तु यद्यपि महाराज ने उन्हें पन्हालगढ़ की सूबेदारी सौंप दी थी तथापि उन्हें ऐसा लगता था जैसे वे वहाँ मेहमान हों। एक तो उनके साथ काम करने के लिए हिरोजी फर्जन्द, जनार्दन पन्त, सुमन्त जैसे अनुभवी लोगों के साथ सोमाजी बंकी और बर्हिर्जी नाइक जैसे नौसिखिये नियुक्त किये गये थे। फर्जन्द रिश्ते में शम्भूराजा के चाचा थे परन्तु उनमें अब पहले जैसा अपनापन नहीं था। किले का अन्य प्रबन्ध अष्टप्रधानों के निर्देश से चल रहा था। ऐसी स्थिति में शम्भूराजा को परायेपन का अनुभव हो रहा था। ढाई तीन महीने पहले जब बड़े महाराज रायगढ़ के लिए प्रस्थान कर रहे थे। तब शम्भूराजा ने उनसे पूछा था—"पिताजी ! हम कितने दिनों बाद वहाँ आयें ? "पिताजी, मुझे लगता है कि मेरे सम्बन्ध में आपके मन में जो संशय उत्पन्न हुआ था। वह अभी तक मिट नहीं पाया। क्या इसे हम अपना दुर्भाग्य मानें ?" अपने को न रोक पाने के कारण शम्भूराजा ने कह दिया। शिवाजी महाराज का मन गद्गद हो गया। उन्होंने कहा, "शम्भू बेटे ! आपका हृदय कितना पाक साफ है? इसका साक्ष्य मुझे किसी और से नहीं लेना है। किन्तु रायगढ़ की जहरीली हवा अभी आपके स्वास्थ्य के अनुकूल नहीं है। समय के साथ ये जहरीले काँटे अपने आप दूर हो जाएँगे। आपस की खाइयाँ पट जाएँगी, मन परस्पर जुड़ जाएँगे। इसके बाद हम सभी रायगढ़ में एकत्र होंगे। जगदीश्वर का अभिषेक करना है, आपस में बहुत कुछ बोलना है, करना है।" उन चार दिनों में पिता पुत्र के बीच घटित दीर्घ संवाद शम्भूराजा के मानस पटल पर ताजा बना रहा। उसी बीच रायगढ़ पर राजाराम के यज्ञोपवीत संस्कार और विवाह के आयोजन का समाचार मिला। महाराज ने राजाराम का विवाह प्रतापराव की पुत्री के साथ निश्चित किया था। यह शुभ समाचार जब युवराज और युवराज्ञी को मिला तो वे बहुत प्रसन्न हुए थे। किन्तु विवाह समारोह का निमन्त्रण शम्भूराजा को नहीं आया। शम्भूराजा को पक्का विश्वास था कि आज नहीं तो कल निमन्त्रण अवश्य आएगा। किन्तु वैसा कुछ नहीं हुआ। शम्भूराजा और येसूबाई ने भी रायगढ़ जाने का निश्चय किया था। इसी बीच रायगढ़ से हिरोजी फर्जन्द, जनार्दन पन्त और अनेक छोटे-बड़े मुंशियों तक के लिए निमन्त्रण आ गये। जनार्दन पन्त के पोते विवाह में जाने के लिए सजधज कर बैठे थे। दो-ढाई साल की छोटी भवानी दौड़ती हुई आयी और येसूबाई के गले से लिपटकर 168 :: सम्भाजी

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