छत्रपति संभाजी महाराज (धर्मवीर स्वराज्य-रक्षक एवं मुग़ल-प्रतिरोध सम्पूर्ण इतिहास)
Chhatrapati Sambhaji Maharaj Comprehensive Historical Biography
कमल गोखले / ऐतिहासिक शोध मण्डल द्वारा
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संदर्भ में पढ़ेंओर ब्राह्मणों का दल है तो दूसरी ओर चाँदसेनी कायस्थ प्रभुओं का। यहाँ दरबार में अण्णाजी दत्तो पन्त और बालाजी आवजी का सुर नहीं मिलता। ऊँच नीच के भेदभाव से मराठा जाति हमेशा के लिए पंगु हो गयी है। ऐसे अविश्वासपूर्ण दूषित वातावरण में स्वराज्य का बँटवारा करना यानी संकट के कीचड़ में और गहरे धँसना है। भविष्य में जो कुछ होगा उसका निर्णय समय स्वयं करेगा।" बड़े महाराज खड़े हो गये। प्रधानमंडल ने भी जाने की तैयारी की। उसी समय बड़े महाराज कुछ रुके। सभी की ओर देखते हुए अत्यन्त कातर स्वर में बोले— "शम्भुराजा के जन्म के समय हम प्रतापगढ़ की लड़ाई में व्यस्त थे। जिस समय शम्भुराजा का जन्म हुआ पुरन्दर के किले पर घनघोर वर्षा हो रही थी। वह छोटा सा कोमल मांस का गोला सईबाई ने मुझे और जीजा माता को सौंप दिया। अपने इस नवजात शिशु को छोड़कर बीमारी से जर्जर उसकी माँ भगवान को प्यारी हो गयी। शम्भू को जब मैंने अपने सीने से लगाया तो उसने मेरी उँगली जोर से पकड़ रखी थी। तब से अब तक मैंने और मेरे राजसी वस्त्रों के भीतर छिपे उसके पिता ने उसे बहुत समीप से जाँचा परखा है। रानी साहिब सोयराबाई, अण्णाजी पन्त! आपको हमारे शम्भुराजा क्रोधी स्वभाव के लग सकते हैं। किसी को उद्द्यत भी लग सकते हैं। किन्तु उस बात को भी हमेशा स्मरण रखें जिसकी याद मुझे जीजा माता दिलाती रहती थीं, वे कहती थीं, "शिवा! शम्भू के बाहर से दिखने वाले अनगढ़ और उद्यत स्वभाव पर कभी मत जाओ। वह खरे सोने की मुहर है। भविष्य में तुम्हारे हिन्दवी स्वराज्य पर कोई आपदा आएगी तो यही तुम्हारा पागल बेटा अपने प्राणों की बाजी लगा देगा किन्तु अपने सम्मान पर आँच नहीं आने देगा। इस बात को गाँठ बाँध लो।" चार भोगावती की घाटी और सुदूर विशालगढ़ की पगडंडियों से बादल उठते थे। म्हसाई के विस्तृत पठार से तैरते हुए आगे आते थे। उधर से आने वाले मेघों के आकार इतने चौड़े टेढ़े-मेढ़े और बिखरे हुए होते थे कि लगता था जैसे जटायु जैसा कोई विशाल पक्षी आकाश में उड़ानें भर रहा हो। कभी कभी फटे पंखों-सी मेघ- छायाएँ अशुभ के बीज बोती आती थीं और दैत्यों की भाँति आती थीं और भागते हुए सम्भाजी · 167