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छत्रपति संभाजी महाराज (धर्मवीर स्वराज्य-रक्षक एवं मुग़ल-प्रतिरोध सम्पूर्ण इतिहास)

छत्रपति संभाजी महाराज (धर्मवीर स्वराज्य-रक्षक एवं मुग़ल-प्रतिरोध सम्पूर्ण इतिहास)

Chhatrapati Sambhaji Maharaj Comprehensive Historical Biography

कमल गोखले / ऐतिहासिक शोध मण्डल द्वारा

DevanagariHindipublished793 पृष्ठ

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उन्होंने पत्र के साथ लगी चन्दन की डंडी महाराज के हाथ में पकड़ा दी। उसकी रेशमी डोरी खोलते हुए महाराज ने कहा, "यह देखो! कर्नाटक जाते समय मैंने शम्भू के आसपास गुप्तचरों को नियुक्त कर दिया था। शम्भू और दिलेरखान के बीच पत्राचार आरम्भ था। इसकी सूचना हमारे गुप्तचरों को थी। अनेक बार युवराज के पत्र को हस्तगत कर उसकी प्रतिलिपि गुप्तचर मेरे पास कर्नाटक भेजते थे। दिलेरखान को श्रृंगारपुर से भेजे गये शम्भू के पत्र की यह प्रतिलिपि देखिए। क्या लिखते हैं, हमारे बेटे इस पत्र में- " 'हमारे पिताजी मुझ पर भरोसा रखकर परदेश गये हैं। ऐसे में उन्हें धोखा देकर, आपके साथ मेलजोल रखना, हमारे धर्म को शोभा नहीं देता।' मित्रो ! आपको कुछ फर्क इसमें दिखाई देता है ? सत्ता के लिए अपने सगे भाइयों और बच्चों का बकरी की तरह सिर छाँट देने वाले कहाँ मुगलों के शहजादे और कहाँ यह पिता की अनुपस्थिति में राज्य की हानि करने से डरने वाला बहादुर राजकुमार ? यही अन्तर होता है मुगलों के शहजादों और मराठों के युवराज में।" महाराज की मुखमुद्रा बहुत व्यथित दिख रही थी। उन्होंने अपने सहयोगियों से कहा, "दिलेरखान से जाकर मिलने का संभाजी का अपराध, एक प्रकार का अविवेक था। जवानी का पागल नशा था। अपने बारे में झूठी कल्पनाओं का एक दौरा था, इसमें कोई शक नहीं है। किन्तु उसी समय आपको यह भी ध्यान में रखना चाहिए कि यदि मराठी स्वराज्य का गला घोंटने और माता भवानी का सिर फोड़ने की गद्दार भावना से शम्भूराजा सचमुच पागल हो गया होता तो क्या होता? बताइए, बताइए! हमारी अनुपस्थिति में सीधे रायगढ़ पर आकर बगावत का नारा लगा देते तो ? यह भयानक समाचार पाने के बाद हमें घोड़ा दौड़ाते हुए यहाँ पहुँचने में कम-से-कम चार दिन लग जाते। तब तक कौन जाने कौन सी रामायण यहाँ घट चुकती?" महाराज की बात सुनकर सभी प्रधान चुप हो गये। अब दरबार में कोई भी कुछ बोल नहीं रहा था। महाराज की मुखमुद्रा, उनके भावभरे स्वर की गम्भीरता कुछ अलग ही लग रही थी। उन्होंने दुखी स्वर में कहा- "कुछ महीने पहले अपने दोनों पुत्रों संभाजी और राजाराम में राज्य का बँटवारा करने का मेरा विचार था। राज्य शिवाजी का हो या प्रभु रामचन्द्र का, राजा प्रधान होता है, शेष सभी अधिकारी और जनता मिट्टी के पुतले होते हैं। इसीलिए असंख्य बीमारियों ने सभी को ग्रस रखा है। आज स्वराज्य की पालकी उठाने के बदले लोग अपने-अपने स्वार्थों की टोकरियाँ ढोने में लगे हैं। परस्पर द्वेष और भेदभाव इतना बढ़ गया है कि किसी समय तोरणा किले पर किये गये मेरे मन्त्रघोष का एक भी स्वर आज बचा नहीं है। यहाँ हमारे अष्टप्रधानों में भी झगड़े हैं। एक 166 . सम्भाजी