छत्रपति संभाजी महाराज (धर्मवीर स्वराज्य-रक्षक एवं मुग़ल-प्रतिरोध सम्पूर्ण इतिहास)
Chhatrapati Sambhaji Maharaj Comprehensive Historical Biography
कमल गोखले / ऐतिहासिक शोध मण्डल द्वारा
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संदर्भ में पढ़ेंके ऊपर से कालदरी में जा गिरे और चूर-चूर हो गये। इस घटना की जानकारी आप को भी है।" दरबार में बहुत तनाव का वातावरण बन गया था। महाराज के स्वाभिमानी मन के तार को अण्णाजी पन्त ने छेड़ दिया था। अण्णाजी पन्त चाहते थे कि राजाराम के विवाह के अवसर पर या किसी अन्य निमित्त से शम्भूमहाराज रायगढ़ न आ सकें। इसीलिए उन्होंने इस प्रसंग को छेड़ा था। अपने उद्देश्य की पूर्ति के लिए उन्होंने महाराज के क्रोध की भी चिन्ता नहीं की। इसी समय अन्तःपुर की ओर खुलने वाले दरवाजे का पर्दा हिला। उस ओर पैर-बिछुओं के बजने की आवाज महाराज ने सुनी। यह आवाज उनकी परिचित थी। महाराज ने धमकाते हुए कहा, "महारानी जी, पर्दे के पीछे से शायद आपको हमारी सारी बातें ठीक-ठीक सुनाई नहीं पड़ेंगी। आप सीधे बाहर ही आ जाइये न?" अपनी दृष्टि पैरों की ओर झुकाए सोयराबाई बाहर आ गयीं। बैठक में आकर एक ओर बैठ गयीं। महाराज ने विवादपूर्ण दृष्टि से महारानी की ओर देखा, मानो कह रहे हों कि संभाजी का एक और प्रेमी व्यक्ति आ गया। महाराज के प्रश्नों से अण्णाजी बहुत डर गये थे, किन्तु महारानी सोयराबाई के आ जाने से उनमें कुछ साहस आ गया। अन्य सभी प्रधान भारी तनाव में आ गये थे। महाराज ने अपने क्रोध को भीतर ही पी लिया। वे संयत स्वर में बोले, "देखिए शम्भूराजा जिस प्रकार हमारे पुत्र और आत्मीय हैं उसी प्रकार आप में से बहुतों के साथ हमारी जीवनभर की मित्रता है। आपने भी स्वराज्य के निर्माण में बड़ा कष्ट उठाया है। इसे हम कभी नहीं भूल सकते।" अण्णाजी पन्त ने अपने ओंठ आधे खोले। उन्होंने महारानी सोयराबाई की आँखों में झाँका। उन्हें अपने प्रति विश्वास और सहानुभूति दिखाई पड़ी। अण्णाजी पन्त में साहस आ गया। उन्होंने कहा, "महाराज ! क्या इन बातों का हम यह अर्थ निकालें कि ऐसी कोई घटना घटी ही नहीं। शम्भूराजा यवनों से जाकर मिले ही नहीं। वे वहाँ गये ही नहीं थे। श्रृंगारपुर के महल में ही बैठे थे— ?" "अण्णाजी पन्त, यह मत भूलो कि शम्भूराजा दिन दहाड़े खुल्लमखुल्ला यवनों से मिले थे। प्रश्न यह उठता है कि यवनों से मिलकर उन्होंने स्वराज्य का क्या अहित किया ? मोरोपन्त कहाँ हैं ? उन्हें बुलाइए।" "महाराज ! युवराज अल्हड़ स्वभाव के हैं। किसी को वे उपद्रवी भी लग सकते हैं। किन्तु मैं शपथपूर्वक कह सकता हूँ कि वे मन के बहुत साफ हैं।" अण्णाजी पन्त और सोयराबाई की जहरीली नजरों की चिन्ता किये बिना, बालाजी पन्त चिटणीस ने कहा। महाराज के आदेशानुसार एक गुप्त पत्र लेकर मोरोपन्त पेशवा दरबार में आये। सम्भाजी : 165