छत्रपति संभाजी महाराज (धर्मवीर स्वराज्य-रक्षक एवं मुग़ल-प्रतिरोध सम्पूर्ण इतिहास)
Chhatrapati Sambhaji Maharaj Comprehensive Historical Biography
कमल गोखले / ऐतिहासिक शोध मण्डल द्वारा
पृष्ठ 180, कुल 793 में से
संदर्भ में पढ़ेंदरबार में कहना उचित नहीं है। किन्तु समय ऐसा आ गया है कि चुप बैठना पाप होगा। हमारे सौभाग्य अलंकार बड़े महाराज ने इस विषय पर मुझसे अनेक बार चर्चा की है। उनके विचार से शम्भू उग्र स्वभाव का ऐसा तरुण है जिसके भीतर अनेक दुर्गुणों और व्यसनों का भंडार भरा है। वह व्यवहार में उद्धत और गैरजिम्मेदार है। औरंगाबाद और बहादुरगढ़ पर रहकर आने के बाद उसका खान पान, आचार- विचार, मुसलमानों की विलासी आदतें आदि उसमें भर गयी हैं। यदि ऐसी उद्धत और विलासी प्रवृत्ति का युवक गद्दी पर आ जाय तो राज्य टूट जाएगा, डूब जाएगा।'' सोयराबाई और अण्णाजी की कहानियों से बैठक का रूप ही बदल गया। राजाराम को गद्दी पर बिठाकर उनके नाम से कार्यभार सँभालने का निर्णय लिया गया। मोरोपन्त की भूरी आँखें चमक उठीं। उन्होंने शान्त स्वर में कहा, "हमने तो राजाजी का नमक खाया है। उन्हीं की सौगन्ध खाकर स्पष्ट रूप से कहता हूँ कि ज्येष्ठ पुत्र के जीवित होते हुए क्रिया कर्म के लिए उसे न बुलाना, उत्तराधिकार में रोड़े अटकाना, धर्मशास्त्र के नियमों को नकारना जैसी बातें मुझे बिलकुल पसन्द नहीं हैं।'' "सुनिए, यह किसी एक का नहीं पूरे राजमण्डल का निर्णय है।" अण्णाजी ने क्रुद्ध होकर कहा। "भाइयो आप जैसा भी चाहे वैसा निर्णय लेने का आपको अधिकार है। परन्तु इस पाप कर्म में आप मुझे न घसीटें।" मोरोपन्त की इस भूमिका से सभी के चेहरे का रंग उड़ गया। महारानी सोयराबाई तो कुछ अधिक ही बेचैन हो उठीं। अण्णाजी को लगा कि उनके अब तक के सारे प्रयत्नों पर पानी फिर जाएगा। अण्णाजी ने क्रोधावेश में सन्तप्त होकर कहा, "पेशवा, आपको इस बात का ध्यान है कि आप क्या बोल रहे हैं?" "अण्णाजी पन्त आप अपने दिमाग को शान्त रखें तो ठीक होगा।" अपने स्वर को बिना जरा भी विचलित करते हुए मोरोपन्त ने कहा, "राजाराम का विरोध करने का कोई कारण नहीं है। परन्तु भाइयो, यह समय कठिन परीक्षा का है। कल यदि दिल्लीश्वर औरंगजेब की फौज पानी के पहाड़ की तरह आकर अपने राज्य पर बरस गयी तो उसकी नाक में नकेल कौन डालेगा?" "वाह! मोरोपन्तजी, इसका मतलब हम सभी नामर्द हैं और सिर्फ आपके शम्भूराजा अकेले बड़े बहादुर हैं।" अण्णाजी ने उपहास करते हुए कहा। "हाँ, हाँ, शम्भूराजा ही सच्चे बहादुर हैं। मराठी राज्य में उनकी बराबरी 178 :: सम्भाजी