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छत्रपति संभाजी महाराज (धर्मवीर स्वराज्य-रक्षक एवं मुग़ल-प्रतिरोध सम्पूर्ण इतिहास)

छत्रपति संभाजी महाराज (धर्मवीर स्वराज्य-रक्षक एवं मुग़ल-प्रतिरोध सम्पूर्ण इतिहास)

Chhatrapati Sambhaji Maharaj Comprehensive Historical Biography

कमल गोखले / ऐतिहासिक शोध मण्डल द्वारा

DevanagariHindipublished793 पृष्ठ

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अण्णाजी ने बहुत चिल्ल-पों मचाई किन्तु प्रधान मंडली में से कोई भी उनके सहयोग के लिए तत्काल तैयार नहीं हुआ। अण्णाजी भी कच्चे गुरु के चेले न थे। वे बड़े उस्ताद थे। स्वराज्य के नाम पर उन्होंने बहुत धन जोड़ रखा था। इसीलिए अन्य प्रधान सोचते थे कि शम्भूराजा के सामने यदि अण्णाजी का कच्चा-चिट्ठा खुलता है तो खुलने दो, हमें उससे क्या? प्रधानों और अधिकारियों का उदासीन प्रतिसाद अण्णाजी को बहुत अखरा। वे दाँत से ओंठ काटते हुए और अपनी नुकीली मूँछों पर हाथ फेरते हुए बोले, "चलो हमें दिखाई पड़ रहा है कि आप लोगों को शम्भूराजा की चाटुकारिता करना ही अच्छा लगेगा। आप लोग खुशी से उनकी चाकरी करो। मुझे तो यहाँ एक पल के लिए भी चैन नहीं आएगा। उसकी अपेक्षा हाथ में कटोरा और लाठी लेकर काशी यात्रा करना मुझे अधिक अच्छा लगेगा।" अण्णाजी ने फिर से एकबार सब पर नजर डाली। किन्तु किसी का भी समर्थन न मिलने से निराश हो गये। महारानी सोयराबाई की समझ में आ गया कि बैठक में अण्णाजी अकेले पड़ रहे हैं। उन्हें लगा कि राजमाता होकर भी उनके सारे मनोरथ टूट जाएँगे! राजमाता बनकर दरबार में बैठना तो दूर उन्हें अपने साथियों का साथ भी नहीं मिल रहा था। उन्हें देखकर ऐसा लग रहा था मानो यात्रियों के साथ से छूटकर अकेले काशी यात्रा को निकली हों। फिर दरबारियों को आड़े हाथों लेती हुई बोलीं, "अण्णाजी पन्त क्या केवल अपने भले के लिए यह सब कह रहे हैं? आज महाराज के स्वर्गवासी होने से स्वराज्य के जहाज के डूबने का समय आ गया है। ऐसे समय में भले-बुरे की चिन्ता न करने वाले शम्भूराजा के पाप में सने पैर यदि सिंहासन पर पहुँच गये तो कैसे अनर्थ होगा? इसकी कल्पना किसी ने की है क्या?" स्वयं महारानी ने नेतृत्व सँभाला तो बैठक में हवा की दिशा ही बदल गयी। वैसे सभी कर्मचारी शम्भूराजा से किसी-न-किसी कारण दुखी थे। इसलिए अब उन सभी को शम्भूराजा में कोई-न-कोई दोष दिखाई देने लगा। जो शान्त स्वभाव के थे, वे भी मौका देखकर शम्भूराजा की शिकायत करने लगे। न्यायाधीश प्रह्लाद निराजी ने कहा, "बड़े महाराज मात्र पुत्रमोह के कारण उन्हें बुरा नहीं कहते थे। मैं दावे के साथ कहता हूँ कि उनके जैसे उग्र स्वभाव वाले व्यक्ति के लिए राज्य सँभालना बहुत कठिन है।" "इसीलिए कहता हूँ जल्दी कीजिए। औरंगजेब जैसा शत्रु दरवाजे पर खड़ा है। आक्रमण होने से पहले राजाराम के हाथों में सारा कार्यभार सौंप दीजिए और निश्चिन्त हो जाइए। इसी में हम सब का कल्याण है।" अण्णाजी ने सुझाव दिया। सभी को शांत करके महारानी कड़े शब्दों में कहने लगीं-"घर की बात को सम्भाजी :: 177