छत्रपति संभाजी महाराज (धर्मवीर स्वराज्य-रक्षक एवं मुग़ल-प्रतिरोध सम्पूर्ण इतिहास)
Chhatrapati Sambhaji Maharaj Comprehensive Historical Biography
कमल गोखले / ऐतिहासिक शोध मण्डल द्वारा
पृष्ठ 178, कुल 793 में से
संदर्भ में पढ़ेंइधर-उधर देखते हुए अण्णाजी ने धीमे कि तेज स्वर में कहा, "बाहर लोगों की जिह्वाएँ कुछ अधिक ही हिलने लगी हैं। वे कह रहे हैं कि राज्य के लोभ ने महारानी को अन्धा कर दिया है। उन्होंने ही महाराज को विष दे दिया है। सोयराबाई ने ही महाराज को मार डाला।" इससे सोयराबाई बहुत क्षुब्ध हुई। किन्तु समय गँवाने से कोई लाभ न था। तत्परता से भविष्य का निर्णय लेना आवश्यक था। उसी दिन दोपहर को निजी दरबार में रामचन्द्र नीलकंठ, न्यायाधीश प्रह्लाद और राहुजी सोमनाथ जैसे विशिष्ट लोग चर्चा के लिए एकत्र हुए। चर्चा आरम्भ हुई। बहुत समय बीत जाने पर पेशवा मोरोपन्त पिंगले वहाँ नहीं आये। वैसे भी अण्णाजी को मोरोपन्त पर भी विश्वास न था। नासिक से रायगढ़ आने में भी पन्त को विलम्ब हुआ था। अण्णाजी पहले पहुँच गये थे। शम्भूराजा के विरोधियों को एकत्र करने का सुअवसर मिला था। इससे अण्णाजी मन ही मन बहुत प्रसन्न थे। बैठक में मोरोपन्त के सम्मिलित न होने से कुछ लोगों की दृष्टि वक्र होने लगी। लोग सशंक होने लगे। अण्णाजी दत्तो बेचैन होकर उठ गये। वे अब तक मोरोपन्त के पास तीन बार दूत भेज चुके थे। किन्तु फिर भी वे नहीं आये। इससे अण्णाजी बहुत बेचैन हो गये। अन्ततः परिस्थिति के असह्य हो जाने पर उन्होंने राहुजी सोमनाथ से कहा, "अब आप उठिए। साथ में सेना लेकर मोरोपन्त की हवेली पर जाइए और उन्हें नजरबन्द कीजिए। इसके बिना उनके जैसे अभिमानी व्यक्ति का अहंकार उतरेगा नहीं।" इसी समय दुबले-पतले गेहुँए रंग के मोरोपन्त पेशवा सामने आकर खड़े हो गये। अण्णाजी के कुछ शब्द उनके कानों से टकरा गये थे। इसी से मोरोपन्त की भूरी आँखें कुछ तिरछी हो गयी थीं। उन्होंने शम्भूराजा के विरोध में एकत्र इन दिग्गजों को देखा और कुछ पीछे हटकर नम्रतापूर्वक नीचे बैठ गये। "बोलो भाइयो, बोलो। समय बहुत कठिन है। सीमा पर शत्रु खड़ा है। ऐसे समय में विवेकपूर्ण निर्णय लेना ही श्रेयस्कर होगा।" अण्णाजी पन्त जोर-जोर से कहने लगे, "अभी एक वर्ष पहले ही जो व्यक्ति मुगलों से जा मिला, जिसने अपने भूपालगढ़ जैसे मजबूत किले को खोद खोदकर गिराया, जिसने अपने पिता के राज्य से गद्दारी की, क्या ऐसे स्वराज्य द्रोही के हाथों में यह स्वराज्य सौंपना है?" अण्णाजी दत्तो के सारे तर्क सभी को बेजोड़ लगे। किन्तु अपनी धीमी और शान्त आवाज में अण्णाजी को रोकते हुए मोरोपन्त ने प्रश्न किया—"हम कहते हैं थोड़ा धीरज रखिए इतनी उतावली किस बात की?" "उतावली?" नीचे बैठे अण्णाजी उठकर खड़े हो गये और कहा, "क्यों? आप शम्भूराजा के आने की प्रतीक्षा कर रहे हैं क्या?" 176 सम्भाजी