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छत्रपति संभाजी महाराज (धर्मवीर स्वराज्य-रक्षक एवं मुग़ल-प्रतिरोध सम्पूर्ण इतिहास)

छत्रपति संभाजी महाराज (धर्मवीर स्वराज्य-रक्षक एवं मुग़ल-प्रतिरोध सम्पूर्ण इतिहास)

Chhatrapati Sambhaji Maharaj Comprehensive Historical Biography

कमल गोखले / ऐतिहासिक शोध मण्डल द्वारा

DevanagariHindipublished793 पृष्ठ

पृष्ठ 182, कुल 793 में से

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गम्भीर प्रश्न यह था कि शम्भूराजा का क्या किया जाय? उनको बन्दी बनाये बिना एक दिन भी राज्य चलाना सम्भव नहीं था। "लिखिए पन्त, अभी का अभी लिखिए।" महारानी सोयराबाई ने कहा, "जनार्दन पन्त सुमन्त को आदेश भेजिए कि वे युवराज को पकड़कर वहीं पन्हाला के बन्दीगृह में डाल दें। उस काँटे को व्यर्थ में यहाँ ले आने की आवश्यकता नहीं है।" मोरोपन्त ने सभी की ओर दृष्टि घुमाई फिर मीठी मुस्कान बिखेरते हुए उन्होंने अण्णाजी से कहा, "अण्णाजी पन्त! आप अपनी उतावली में राज्य के कानून भी भूल गये हैं क्या? कोई भी किलेदार या सूबेदार बालाजी आवजी चिटणीस के हस्ताक्षर और उनकी मुद्रा देखे बिना हुक्म की तामील नहीं करेगा।" मोरोपन्त की बात सुनकर अण्णाजी का सिर घूमने लगा। उन्हें पसीना छूट गया। सोयराबाई की दृष्टि बैठक में बालाजी आवजी को ढूँढ़ने लगी। परन्तु बालाजी बैठक से कब के जा चुके थे। यह बात ध्यान में आते ही सभी चिन्तित हो गये। छह महल के चिराग जल रहे थे। रनिवास से थोड़ी दूरी पर जो जंगली झाड़ियाँ और पेड़ पौधे थे उनसे होकर जोर की हवा चल रही थी। हिरकणी बुर्ज से झींगुरों की किर्रऽऽ किर्रऽऽ सुनाई पड़ रही थी। रनिवास के बाहर बैठक में केवल अण्णाजी पन्त और सोयराबाई बैठे थे। दोनों बहुत तनावग्रस्त थे। अण्णाजी दत्तो ने रुष्ट होकर कहा, "इस बालाजी चिटणीस के गले यह निर्णय कौन उतारेगा? उन्हें तो पहले से ही शम्भूराजा से बहुत लगाव है।" सोयराबाई बेचैन हो गयीं। उन्होंने कहा, "उन्हें आने के लिए सन्देश भेजा है न? मुझे विश्वास है कि मेरा आदेश वे अवश्य मानेंगे।" थोड़ी ही देर में ताड़ की तरह लम्बे बालाजी पन्त बैठक में प्रविष्ट हुए। उन्होंने झुककर सोयराबाई का अभिवादन किया। सोयराबाई ने राज्य की कठिनाइयों का पहाड़ा बड़े मीठे शब्दों में पढ़ा और कहा-'चिटणीस! आपके हस्ताक्षर का पत्र जाना चाहिए।' बालाजी ने कहा, "जब तक हमारी जान में जान है, यह सम्भव नहीं है।" 180 :: सम्भाजी

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