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छत्रपति संभाजी महाराज (धर्मवीर स्वराज्य-रक्षक एवं मुग़ल-प्रतिरोध सम्पूर्ण इतिहास)

छत्रपति संभाजी महाराज (धर्मवीर स्वराज्य-रक्षक एवं मुग़ल-प्रतिरोध सम्पूर्ण इतिहास)

Chhatrapati Sambhaji Maharaj Comprehensive Historical Biography

कमल गोखले / ऐतिहासिक शोध मण्डल द्वारा

DevanagariHindipublished793 पृष्ठ

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"किन्तु यदि आपकी मुहर के साथ पत्र नहीं जाएगा तो कोई भी किलेदार शम्भूराजा को कैद करने का साहस नहीं करेगा।" सोयराबाई ने चिटणीस से बार-बार प्रार्थना की। किन्तु सोयराबाई की प्रार्थनाओं और धमकियों का बालाजी आवजी पर कोई प्रभाव नहीं पड़ा। महारानी से क्षमायाचना करते हुए उन्होंने बड़े आदर से कहा, "हम इस प्रकार कैसे लिख सकते हैं? हमने तो सरकार का नमक खाया है। संभाजी राजा तो हमारे स्वामी हैं।" "फिर भी हम जैसा कहेंगे वैसा हुक्मनामा आपको लिखना पड़ेगा।" अण्णाजी और सोयराबाई ने कठोर स्वर में कहा। "आप हमारे ऊपर व्यर्थ दबाव न डालें। हमारी ओर से यह पाप कभी न होगा।" बालाजी ने स्पष्ट रूप से अपनी अस्वीकृति व्यक्त की। महारानी जी यह सारा मामला हमारी परम्पराओं के विरुद्ध है। बालाजी पन्त आदेश लिखने के लिए तैयार नहीं हुए। वे अपने निर्णय से टस से मस नहीं हो रहे थे। रात समाप्त होने को आयी। समय बीतता जा रहा था। किन्तु बालाजी कुछ भी सुनने को तैयार न थे। तब सोयराबाई ने अत्यन्त कठोर स्वर में पूछा, "चिटणीस! युवराज को कैद करने का आदेश आप लिख रहे हैं या नहीं?" अण्णाजी दत्तो मर्म पर आघात करते हुए बोले, "बालाजी पन्त अब आप बूढ़े हो चुके हैं। आपके निलोबा, खंडोबा जैसे दो छोटे बच्चे हैं। वे फिर से जंजीरे पर जाकर चाकरी तो नहीं करेंगे। उनकी रोटी तो रानी जी के ही हाथ में है। क्यों व्यर्थ में टाँग अड़ा रहे हो? अपने ही हाथों अपने भोजन में मिट्टी मिला रहे हो?" हुक्मनामा लिखे बिना अण्णाजी और महारानी उठने को तैयार ही न थे। रात्रि के बीतने के साथ बालाजी पर भावनात्मक और मानसिक दबाव बढ़ रहा था। वे हाथ जोड़कर धीर-गम्भीर स्वर में बोले, "आप लाख समझाइए किन्तु ये बातें हमारी समझ में नहीं आतीं। यह पाप मुझसे नहीं होगा।" बातें करते-करते बालाजी के सामने अतीत का दृश्य प्रस्तुत हो गया। राजापुर में बेरोजगारी का दिन काटते हुए बालाजी नामक युवक का वह पत्र याद आया। उस पत्र की लिखावट याद आयी जिसने शिवाजी महाराज का मन मोह लिया था। उस स्मृति के सगुण-साकार होते ही बालाजी पन्त गद्गद हो गये। आँखों के आँसू पोंछते हुए उन्होंने कहा, "जिन अक्षरों ने मेरे जैसे अनाथ को हिन्दवी स्वराज्य के चिटणीस पद की ऊँचाई तक पहुँचाया, उन्हीं अक्षरों से धोखा कैसे करूँ? साक्षात् शिवपुत्र संभाजी राजा को कैद करने का हुक्म लिखने का पाप कैसे करूँ? नहीं, नहीं ऐसा नहीं होगा। अण्णाजी पन्त आप भले ही मेरे हाथों की अँगुलियों को काट डालिए पर ऐसे गलत काम के लिए हमारी कलम नहीं चलेगी।" आधी रात को अण्णाजी दत्तो ने बालाजी को ही गिरफ्तार कर उनकी जायदाद सम्भाजी :: 181