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छत्रपति संभाजी महाराज (धर्मवीर स्वराज्य-रक्षक एवं मुग़ल-प्रतिरोध सम्पूर्ण इतिहास)

छत्रपति संभाजी महाराज (धर्मवीर स्वराज्य-रक्षक एवं मुग़ल-प्रतिरोध सम्पूर्ण इतिहास)

Chhatrapati Sambhaji Maharaj Comprehensive Historical Biography

कमल गोखले / ऐतिहासिक शोध मण्डल द्वारा

DevanagariHindipublished793 पृष्ठ

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थे हंबीरराव। उन्होंने अपने सहयोगियों का साथ लिया। उन्होंने रूपाजी भोसले और आनन्दराव मकाजी को विशेष रूप से सावधान किया। प्रतापराव की मृत्यु के समाचार से वे निढाल हो गये थे। उन्होंने पीछे हट रही फौज को दृढ़ता से एकत्र किया। जिस तरह शिकारी जंगली सुअरों को आगे की ओर खदेड़ देते हैं, उसी तरह हंबीरराव ने बहलोलखान की सेना को बीजापुर की ओर खदेड़ दिया। शिवाजी महाराज के सौतले भाई ब्यंकोजी राजा ने साम्राज्य के साथ गद्दारी की थी। तब हंबीरराव ने बड़े साहस के साथ तंजौर की सीमा तक ब्यंकोजी का पीछा किया था और उन्हें पराजित किया था। हंबीरराव की प्रशंसा में शिवाजी महाराज कहा करते थे—"एक हंबीरराव के बदले में फिरंगी हमें किलों को ध्वस्त करने वाली पचास तोपें दें तो भी हम उन्हें अपने से अलग नहीं करेंगे।" इस समय सम्पूर्ण मराठी राज्य का ध्यान रायगढ़ के गृहकलह पर केन्द्रित हो गया था। ऐसे समय में हंबीरराव जैसे शक्तिशाली सेनापति के साथ होने या न होने से दोनों पक्षों में निर्णायक अन्तर पड़ने वाला था। इसलिए दोनों पक्षों से हंबीरराव के पास निवेदन के पत्र आ रहे थे। कल रात तलबीड की हवेली से बाहर निकलते समय हंबीरराव की पत्नी रखमाबाई ने साग्रह कहा था। विदाई के लिए एकत्र हुए सभी मित्रों और सम्बन्धियों की भावना को व्यक्त करते हुए रखमाबाई ने कहा था— "सोयराबाई का पत्र आ चुका है। खून का रिश्ता जन्मभर के लिए उपयोगी होता है। बालक राजाराम तो आपका भांजा ही है। राजाराम को गद्दी दिलाने के लिए आप उसके पीछे वटवृक्ष की तरह खड़े रहें।" यह आग्रह रखमाबाई बार बार दोहरा रही थीं। हंबीरराव के चेहरे पर मन्द मन्द मुस्कान बिखरी हुई थी। रात देर से जब हंबीरराव अपने पड़ाव पर लौटे उनके मुंशी ने पन्हालगढ़ से आया लिफाफा उनके सामने रखा। मशाल की लाल पीली रोशनी में हंबीरराव ने संभाजी राजा का पत्र पढ़ा- "क्षत्रिय कुलावतंस श्री राजा शम्भु छत्रपति की ओर से प्रधान सेनापति हंबीरराव मोहिते को दंडवत प्रणाम। मामा साहब रिश्ते में मैं भी आपका भांजा हूँ। भोसले और मोहिते घराने का सम्बन्ध तीन पीढ़ियों का है। पूज्य पिताजी ने प्रधान सेनापति का मुकुट आपके सिर पर क्यों रखा? सोयराबाई का भाई होने के कारण नहीं बल्कि इसलिए कि महाप्रतापी प्रतापराव गूजर की खाली जगह भरने के लिए आप जैसे एक नर रत्न की आवश्यकता थी। अब पिताजी के चले जाने से हम लोग अनाथ हो गये हैं। जैसा योग्य समझें, निर्णय लें। आप स्वयं सक्षम हैं। मामा जी! और अधिक क्या लिखूँ। बस यही प्रार्थना है कि हमारे सम्बन्ध में कोई दरार न पड़ने पाये।" हंबीरराव का व्यायाम पूरा हो गया था। अब वे पचपन वर्ष के हो रहे थे किन्तु 188 .: संभाजी