छत्रपति संभाजी महाराज (धर्मवीर स्वराज्य-रक्षक एवं मुग़ल-प्रतिरोध सम्पूर्ण इतिहास)
Chhatrapati Sambhaji Maharaj Comprehensive Historical Biography
कमल गोखले / ऐतिहासिक शोध मण्डल द्वारा
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संदर्भ में पढ़ेंउनका जोश और उत्साह यौवन की देहरी पर खड़े तरुणों को भी लज्जित करने वाला था। व्यायाम समाप्त होते ही उन्होंने नदी की ओर छलाँग लगाई। दस-पन्द्रह कदम वे दौड़ते हुए गये, फिर नदी के तट तीन-चार पोरसा गहरे पानी में मल्लाहों के बच्चों की तरह छलाँग लगा दी। नदी की धारा में आड़े तिरछे हाथ मारते हुए प्रसन्नता से तैरते रहे। फिर कछार चढ़कर गीले वस्त्रों में तट पर पहुँच गये। उनके मन में उठने वाली विचार तरंगें अभी भी शान्त नहीं हो रही थीं। उनके नौकर चाकर वस्त्र आदि लेकर खड़े थे। जैसे मेले में कोई पहलवान सजधज कर खड़ा होता है, उसी प्रकार उन्होंने वस्त्रालंकार धारण किया। उनका घोड़ा दुलकी चाल से दौड़ता हुआ पड़ाव पर आ पहुँचा। रास्ते में शिलेदारों और कर्मचारियों का अभिवादन स्वीकार करते हुए हंबीरराव बड़े रौब से अपने डेरे में प्रविष्ट हुए। रूपाजी भोसले और आनन्दराव मकाजी वहाँ बड़ी देर से प्रतीक्षा कर रहे थे। रूपाजी ने निवेदन किया, "सेनापति जी, रायगढ़ से अण्णाजी और मोरोपन्त कल रात में ही उंब्रज पहुँच चुके हैं।" "किसलिए ?'' हंबीरराव ने अनजान की तरह प्रश्न किया। "आप से मान मनौवल करने के लिए। आप के साथ पन्हाला जाकर शम्भुराजा बेडियाँ पहनाना चाहते हैं।" आनन्दराव ने उन लोगों की योजना की जानकारी दी। यह सुनकर हंबीरराव कुछ बोले नहीं। अपनी पहलवानी की नटखटी वे नदी के किनारे ही छोड़ आये थे। फौजी छावनी में समाचार पढ़ते हुए, सैनिकों को आदेश देते हुए उनमें एक अलग ही दबदबा दिखाई पड़ता था। हंबीरराव को इसके पहले लिखे गये शम्भुराजा के एक पत्र की याद आयी। उन्होंने पत्रों का बस्ता खोला। उनकी दृष्टि लिफाफे पर घूमने लगी। उन्होंने पत्र पढ़ा—"क्षत्रिय कुलावतंस श्री राजा शम्भू छत्रपति की ओर से राजश्री हंबीरराव मोहिते प्रधान सेनापति को। तीर्थरूप पिताजी का महानिर्वाण हो जाने से हमारे सिर पर तो आसमान ही टूट पड़ा। ऐसी महाविपत्ति के समय एक ही अच्छी बात हुई। मृत्यु के तीन महीने पूर्व पन्हालगढ़ पर पिताजी का लम्बा साहचर्य मिला। चार-पाँच दिन तक उनके साथ निरन्तर विचार-विमर्श होता रहा। मन में जो दुविधा या किन्तु-परन्तु था, वह मिट गया। मुगलों की ओर चले जाने से मेरे अविवेक को भी पिताजी ने क्षमा कर दिया। तीर्थ रूप पिताजी का मन पहाड़ जैसा विशाल था। उन्होंने मुझे क्षमा ही नहीं किया मुगलों के विरुद्ध नया मोर्चा खोलने का आदेश भी दिया। उन्होंने मेरी जिम्मेदारियाँ भी समझाईं। पिताजी के अचानक चले जाने का कष्ट तो असह्य है। स्मरण होते ही आँखें छलकने लगती हैं। किन्तु फिर भी माँ भवानी की कृपा से पुनः कमर कसकर खड़ा होने का मैंने दृढ़ संकल्प किया है। सम्भाजी :: 189