छत्रपति संभाजी महाराज (धर्मवीर स्वराज्य-रक्षक एवं मुग़ल-प्रतिरोध सम्पूर्ण इतिहास)
Chhatrapati Sambhaji Maharaj Comprehensive Historical Biography
कमल गोखले / ऐतिहासिक शोध मण्डल द्वारा
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संदर्भ में पढ़ेंखेद है कि कुछ मन्त्री और अधिकारी तिरछी चाल चल रहे हैं। उनके दिल में कपट है। वे बालक राजाराम को गद्दी पर बिठाने का घातक विचार माताजी के सिर में भर रहे हैं। अपने स्वार्थ के कारण राजकुल में झगड़ा कराना चाहते हैं। मामाजी! मैं आप का सगा भांजा भले न होऊँ किन्तु हिन्दवी स्वराज्य के निर्माता शिवाजी महाराज का पुत्र तो हूँ। मैं एक दिन उस पापी औरंगजेब का काल अवश्य बनूँगा। बादशाह औरंगजेब बहुत उन्मत्त हो गया है। जजिया कर का हथियार हमारे सिर पर चलाना चाहता है। पिताजी के संकल्पों को पूरा करने की दिशा में हम अग्रसर हैं। इस अभियान में हमें आपके आशीर्वाद की अपेक्षा है।'' शम्भुराजा के संवेदनशील शब्दों ने उस दोपहर में हंबीरराव को बहुत प्रभावित किया था। इसी समय उन्हें समाचार मिला कि मराठी राज्य के महत्त्वपूर्ण प्रधान उनसे मिलने आये हैं। हंबीरराव ने खिड़की का पर्दा हटाकर बाहर झाँका। तपती धूप में एक धूप छाँही घोड़ा आगे बढ़ रहा था। उस पर सवार मोरोपन्त पेशवा बहुत थके दिखाई पड़ रहे थे। धूप में उनकी कनपटी और नाक कुछ अधिक लाल हो गयी थी। जबरदस्ती घोड़े पर बिठाये गये बच्चे की तरह वे बेचैन हो रहे थे। पीछे-पीछे काले कलूटे और गठीले शरीर वाले कहार दौड़ते आ रहे थे। अपने कन्धों पर रखी भारी भरकम पालकी के कारण वे बेदम हो रहे थे। पालकी में हृष्ट पुष्ट देह वाले अण्णाजी दत्तो बैठे थे। पालकी में अधिक समय से बैठे रहने के कारण वे भी उकता गये थे। हंबीरराव ने अपने डेरे से अपने विश्वासपात्र लोगों को भी हटा दिया। अब वहाँ पर अण्णाजी पन्त, मोरोपन्त पेशवा और सेनापति हंबीरराव के अतिरिक्त और कोई भी नहीं था। अण्णाजी और मोरोपन्त को लगा कि आरम्भ में ही कुछ गड़बड़ हो गयी है। इसलिए वे मूल विषय को आरम्भ नहीं कर रहे थे। यह स्थिति हंबीरराव की समझ में आ गयी। इसलिए हंबीरराव ने स्वयं ही आरम्भ किया—‘‘पन्त जिस उद्देश्य से बड़ी अपेक्षा लेकर आप लोग इस डेरे में आये हैं, मुझे नहीं लगता कि आपकी वह मनोकामना पूरी हो सकेगी।’’ आरम्भ में ही ऐसी स्पष्ट नकार मिलेगी, ऐसी तो उन दोनों ने कल्पना तक न की थी। लोग कहते हैं कि पहलवानों का दिमाग घुटने में होता है। इसलिए उन लोगों ने सोचा था कि दाव-पेंच लगाकर आरम्भ में ही हंबीरराव को चित्त कर देंगे। अपनी इच्छा के अनुसार उन्हें तैयार करके सेना के साथ पन्हालगढ़ की ओर भगा देंगे। परन्तु आरम्भ में ही उन्हें मुँह की खानी पड़ी तो उनका मुँह देखने लायक हो गया। अण्णाजी दत्तो ने क्रोध से कहा—‘‘ऐसा कैसे? आपने लिखित वचन दिया है 190 :: सम्भाजी