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छत्रपति संभाजी महाराज (धर्मवीर स्वराज्य-रक्षक एवं मुग़ल-प्रतिरोध सम्पूर्ण इतिहास)

छत्रपति संभाजी महाराज (धर्मवीर स्वराज्य-रक्षक एवं मुग़ल-प्रतिरोध सम्पूर्ण इतिहास)

Chhatrapati Sambhaji Maharaj Comprehensive Historical Biography

कमल गोखले / ऐतिहासिक शोध मण्डल द्वारा

DevanagariHindipublished793 पृष्ठ

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युवराज शीघ्रता से स्नानगृह की ओर मुड़े। उन्हें पूजा आदि समाप्त करके शीघ्र ही बाहर निकलना था। अब तक रायगढ़ पर प्रकाश पूरी तरह फैल चुका था। जगह जगह पर लेज़िम और गतका खेलने वाले बच्चों के झुंड जमा हो रहे थे। शहनाई और नगाड़े बज रहे थे। फूलों की सजावट और रंगोलियाँ सज रही थीं। नवयुवक इधर-उधर घूम रहे थे। इस प्रकार शिवाजी महाराज के महल के सामने उत्सव का वातावरण बना हुआ था। इसी समय पूरी तरह भयभीत त्र्यम्बकराव और निवासराव वहाँ पहुँचे। वहीं पर उन्हें पता चला कि गोदू संभाजी महाराज के महल में गयी है। पिता पुत्र इस बात को अच्छी तरह जानते थे कि यदि गोदू उनसे पहले शिवाजी महाराज के पास पहुँच गयी और उनके षड्यन्त्र का भंडाफोड़ कर दिया तो उनके लिए मारकर खाई में फेंक देने के अतिरिक्त कोई अन्य सजा नहीं होगी। वाड़कर पिता-पुत्र कुछ डरे किन्तु तुरन्त ही सँभल गये। उन्होंने सोचा कि गोदू हमारे बारे में शिवाजी महाराज से कुछ कहे उससे पहले हम ही उसको बदनाम कर दें। यह मौका अपने आप उन्हें मिल गया था। यह मौका था अपने गले में पड़ी जलती फटाकों की माला को असावधान युवराज के गले में डाल देने का। औरतों के नाम पर युवराज को बदनाम करने का षड्यन्त्र पहले से ही चल रहा था। उसमें गोदू का एक नाम और जोड़ देना था। उन्होंने सोचा कि आयी हुई यह विपत्ति किसी प्रकार टल जाय तो अच्छा है। वाड़कर पिता पुत्र युवराज के महल की ओर बढ़े। किन्तु महल के पास पहुँचने पर उनके पैर डर के मारे काँपने लगे। दोनों ने एक दूसरे को उकसाने का प्रयत्न किया किन्तु सिंह की गुफा में जाकर उसे ललकारने का साहस उनमें नहीं था। भयभीत होकर पिता पुत्र ने अपने घोड़े शिवाजी महाराज के महल की ओर दौड़ाये। आज रंगपंचमी के उत्सव में सम्मिलित होने के लिए महाराज के महल के सामने बहुत भीड़ जमा हो गयी थी। पाँच पाँच कोस की दूरी से शौकीन और उत्साही लोग उत्सव में भाग लेने के लिए आये थे। थोड़ी ही देर में महाराज पालकी में बैठकर जगदीश्वर मन्दिर की ओर जाने वाले थे। इसी समय त्र्यम्बकराव उल्टी मुट्ठी मुँह पर रखकर जोर-जोर से चिल्लाने लगा, "भगा ले गये हो भगा ले गये युवराज इस गरीब की पुत्रवधू को भगा ले गये!'' “अब मैं बिना पत्नी के कहाँ जाऊँ? अपने रिश्तेदारों को क्या मुँह दिखाऊँ?” अपने ही हाथों से अपने मुँह पर चपत लगाते हुए निवासराव जोर-जोर से रोने लगा। वहाँ पर इकट्ठा हुए दर्शक और सरदार यह दृश्य देखकर चकरा गये। शिवाजी महाराज के ज्येष्ठ पुत्र पर कोई ऐसा आरोप लगाता है क्या! कल राजगद्दी 18 :: सम्भाजी