छत्रपति संभाजी महाराज (धर्मवीर स्वराज्य-रक्षक एवं मुग़ल-प्रतिरोध सम्पूर्ण इतिहास)
Chhatrapati Sambhaji Maharaj Comprehensive Historical Biography
कमल गोखले / ऐतिहासिक शोध मण्डल द्वारा
पृष्ठ 208, कुल 793 में से
संदर्भ में पढ़ेंसहयोगियों ने शम्भूराजा को बहुत समझाया-बुझाया तब जाकर कहीं पालकी आगे बढ़ी। ऊपर महादरवाजे पर शम्भूराजा का धूम-धाम से स्वागत हुआ। वहाँ से वे जगदीश्वर का दर्शन करने गये। दरबार में कार्यकर्ताओं की भीड़ एकत्र थी। महाराज ने उनसे बातचीत की। उस रात टकमक नोंक किसी राक्षस के जबड़े की तरह भयानक दिखाई पड़ रहा था। वहाँ तूफानी हवा चल रही थी। ऊँची-ऊँची पहाड़ियों से टकराती तेज हवा, सनसनाहट की आवाज से सीटी की तरह बजा रही थी। उस अँधेरी रात में विद्रोही गद्दारों की आँखों पर पट्टी बाँध दी गयी। उन्हें टकमक के ऊँचे सिरे से नीचे फेंक दिया गया। उनके शरीर ज्वारी के गट्ठे की तरह नीचे गिरते हुए पत्थरों से टकराते गये। वे गिद्धों और गीदड़ों का भोजन बन गये। एक दिन सुबह पाचाड़ के किले का दरवाजा खुला। वहाँ से अण्णाजी दत्तो और मोरोपन्त जैसे अव्वल दर्जे के कैदियों को बाहर निकाला गया। वे पहरेदारों के संरक्षण में पैदल ही गढ़ पर चढ़ने लगे। मोरोपन्त को अपने अपराध का बोध हो गया था। वे बहुत लज्जित थे। वे थके-हारे और गलित गात्र दिखाई पड़ रहे थे। किन्तु अण्णाजी दत्तो का मन कठोर हो गया था। वे आँखें उठाकर अगल-बगल की ऊँची तटबन्दी को देख रहे थे। अण्णाजी ने जब सुना कि विद्रोही गद्दारों को टकमक की चोटी से नीचे फेंक दिया गया तो उन्हें अनुभव हुआ कि उनका अपराध कितना गम्भीर है? किले पर चढ़ते-चढ़ते दोनों की दृष्टि बार-बार टकमक नोक की ओर जा रही थी। मोरोपन्त ने अण्णाजी से कहा, "अण्णाजी आपका साथ देकर हमने अपनी जिन्दगी नष्ट कर ली। सेवा में कलंक लगा और बाल बच्चों के बीच उपहास के पात्र बन गये।" "जाने दो मोरोपन्त! मैंने तो अब भविष्य के बारे में सोचना ही बन्द कर दिया।" उन्होंने दुखी स्वर में कहा, "मोरोपन्त यदि भाग्य ने साथ दिया तो आप को दंड में कुछ रियायत अवश्य मिल जाएगी। किन्तु मुझसे तो ऐसा कोई भी काम नहीं हुआ है कि शम्भूराजा मुझे जीवित छोड़ें।" उन दो राजबन्दियों को उन्हीं के राजमहलों में बन्द कर दिया गया था। दरवाजे पर सख्त पहरा बिठा दिया गया था। उसी दिन शम्भूराजा ने इन्दुलकर को सामने खड़ा किया। इन्दुलकर की आधी उम्र रायगढ़ के निर्माण में बीती थी। वे जीवन भर राजमहल गढ़िया, चौक और उद्यान बनाते रहे। शरीर को झुलसा देने वाली गर्मी में आषाढ़ की रचना करने में दिन-रात जुटे रहते थे। शिवाजी महाराज विनोद में उन्हें एक अभिमन्त्रित पिशाच कहते थे। यह सोचकर सभी दुखी थे कि ऐसा भला आदमी गद्दारों के साथ कैसे फँस गया? १०५ सम्भाजी