छत्रपति संभाजी महाराज (धर्मवीर स्वराज्य-रक्षक एवं मुग़ल-प्रतिरोध सम्पूर्ण इतिहास)
Chhatrapati Sambhaji Maharaj Comprehensive Historical Biography
कमल गोखले / ऐतिहासिक शोध मण्डल द्वारा
पृष्ठ 207, कुल 793 में से
संदर्भ में पढ़ेंपाचाड़ के सिंहद्वार पर शम्भूराजा के सम्मुख पिलाजीराव शिर्के स्वयं उपस्थित थे। उन्होंने गढ़ सभी महत्त्वपूर्ण जगहों पर पहरे बिठाकर सुरक्षा का उत्तम बन्दोबस्त किया था। अपना दामाद हिन्दवी स्वराज्य का दूसरा छत्रपति बन रहा है। इससे मिलने वाला आनन्द उनके चेहरे पर स्पष्ट झलक रहा था। येसूबाई अपने बड़े भाई गणोजी शिर्के की ओर आश्चर्य से देख रही थी। पन्द्रह दिन पहले वे यह कहकर गये थे—"जब तक मेरी जागीर का कार्य नहीं हो जाता मैं मुँह नहीं दिखाऊँगा।" किन्तु ऐसा कुछ हुआ नहीं। गणोजी शिर्के बड़े कुतूहल से येसूबाई की ओर देख रहे थे। महादजी निम्बालकर का प्रसन्न चेहरा भी महाराज से ओझल न था। जोत्याजी केसरकर महाराज के कान से लगकर कह रहे थे—"आपने सुना क्या महादजी ने मुगलों की नौकरी हमेशा के लिए छोड़ दी।" "ऐसा?" आश्चर्यचकित होकर शम्भूराजा ने कहा। "अपने सगे साले के छत्रपति बन जाने पर दूसरे की नौकरी कौन करेगा?" शम्भूराजा जीजा माता की समाधि के समीप गये। वे वहाँ पर नत मस्तक समाधि के खुरदुरे पत्थरों पर हाथ फेरा। उस स्पर्शमात्र से वे भाव विह्वल हो गये। उनकी आँखों में आँसू भर आये—दुख के भी और आनन्द के भी। यह दृश्य देखकर वहाँ उपस्थित लोगों का मन भर आया। सन्ध्या का समय था। रंगीन फेंटा और नये कम्बलों के साथ भोइयों का जत्था खड़ा था। सोने की पालकी सजाई गयी थी। संभाजी राजा बड़ी प्रसन्नता से पालकी में सवार हो गये। कला वन्तुओं को बगल करते अपनी बाईस वर्षीय तेजस्वी मुखमुद्रा से लोगों को आनन्दित करते हुए शम्भूमहाराज आगे निकल गये। पालकी आगे बढ़ने लगी। साथ की पालकियों में कवि कलश, येसूबाई, पिलाजी शिर्के, हंबीरराव जैसे लोग बैठे थे। जब पालकी चितदरवाजे के पास पहुँची तो शम्भूमहाराज ने कहारों को रोका और नीचे उतरकर एक अतिसामान्य व्यक्ति की तरह पत्थर पर पैर समेटकर बैठ गये। यह देखकर सभी को बड़ा आश्चर्य हुआ। यकायक शम्भूराजा का गला भर आया। वे पिलाजी राव से अत्यन्त पीड़ित स्वर में बोले, "मामा साहब! अब इस सूने गढ़ पर किसलिए जाना है? भगवान के बिना मन्दिर और शिवाजी महाराज के बिना रायगढ़ देखना एक जैसा ही है।" उनका गौर और सरल चेहरा लाल हो गया। बात करते करते संभाजी का कवि मन अत्यन्त भावुक हो उठा। शम्भूराजा भाव विभोर होकर कहने लगे—"मनुष्य कितने भी पुण्य अर्जित करे, चारों धामों की यात्राएँ करे ईश्वर का ध्यान लगाये, यह मेरे लिए व्यर्थ है। मथुरा, वृन्दावन, काशी और रामेश्वरम् किसके लिए हैं? केवल उस अभागे के लिए जिसने रायगढ़ न देखा हो।" सम्भाजी : 205