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छत्रपति संभाजी महाराज (धर्मवीर स्वराज्य-रक्षक एवं मुग़ल-प्रतिरोध सम्पूर्ण इतिहास)

छत्रपति संभाजी महाराज (धर्मवीर स्वराज्य-रक्षक एवं मुग़ल-प्रतिरोध सम्पूर्ण इतिहास)

Chhatrapati Sambhaji Maharaj Comprehensive Historical Biography

कमल गोखले / ऐतिहासिक शोध मण्डल द्वारा

DevanagariHindipublished793 पृष्ठ

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समझ सकते हैं। परन्तु अब आप युवराज नहीं, राजा हैं। आपकी उदारता का गलत अर्थ निकालेंगे, गलत लाभ भी उठाएँगे। दंड का डर न होगा तो गुंडे और भी गुंडागर्दी मचाएँगे।" पूरी बात पर विचार करने के बाद शम्भूराजा ने निर्णय लिया कि हिरोजी को कुछ दिन और नजरबन्द रखा जायेगा। परन्तु उन पर बेड़ियाँ नहीं डाली जाएँगी। उनका किसी भी प्रकार का अपमान किये बिना, बाइज्जत रायगढ़ ले जाया जाएगा। शम्भूराजा ने अपने सैनिकों को इस प्रकार का आदेश दिया। शम्भूराजा के चेहरे पर विषाद छाया हुआ था। उन्हें चिन्तित देखकर कवि कलश ने पूछा—"राजन्! आप इतने चिन्ताग्रस्त क्यों हैं?" "कविराज! जब अपने विश्वासपात्र श्रेष्ठ जनों के षड्यन्त्र के ऐसे नाखून निकल रहे हैं। ऐसी स्थिति में मेरी बुद्धि तो कुछ काम नहीं करती।" "कुछ भी ठीक नहीं है, अनेकों के मत्सर, द्वेष, शाप और हाय के हम लक्ष्य बन चुके हैं।" सेना ने वीरवाड़ी पार की। महाड के समीप चाँभार की घाटी का चक्कर लगाकर सामने की घनी वृक्षावली में प्रविष्ट हो गयी। बीच बीच की छोटी छोटी पहाड़ियाँ कभी पाँव फैलाकर बैठे बैलों की तरह तो कभी शानदार हाथी की तरह दिखाई पड़ती थीं। सामने वृक्षों की संख्या कम हुई तो सामने आसन मारकर बैठे गरुड़ की तरह दिखाई देने लगा। गरूड़ जिस प्रकार सबसे ऊँचे टीले के शीर्ष पर अपना बसेरा बनाता है, वैसे शिवाजी महाराज ने रायगढ़ को चुना था। शम्भूराजा के भीतर अनेक भावनाओं की तरंगें हिलोरें ले रही थीं। यह कितना लम्बा वनवास था ? रायगढ़ के जिस परिसर में शम्भूराजा ने अपना बचपन बिताया था, पुष्प पल्लवों से संवाद करते हुए जहाँ किशोरावस्था को पार किया था। उसी रमणीय परिसर का दर्शन तीन वर्षों बाद हो रहा था। रायगढ़ ने नये राजेश्वर के स्वागत के लिए अपने पंचक्रोशी में नया रूप धारण कर लिया था। फूलों के भार से लदी मेहराबें झुक गयी थीं। ढोल, लेजिम, शहनाई नगाड़ा और तुरुहियों की ध्वनि के साथ शम्भूमहाराज का स्वागत हुआ। पाचाड़ के मैदान पर मानो मेला लग गया था। नीचे तलहटी में वाद्यों की तुमुल ध्वनि हो रही थी। गढ़ पर तोपों की धड़ाम धुडूम की आवाज उठने लगी थी। शिवाजी महाराज की असमय मृत्यु के कारण जो रायगढ़ काला पड़ गया था आन्तरिक षड्यन्त्रों के कारण पागल हो रहा था, वही अब फिर से सज सँवर गया था, उसमें नया जोश भर गया था। वह मंगलदाई दिखाई देने लगा था। गढ़ पर इससे पहले ही राहुजी सोमनाथ कान्होजी मांडवलकर और माल सावंत जैसे षड्यन्त्रकारियों को पकड़ लिया गया था। 204 सम्भाजी