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छत्रपति संभाजी महाराज (धर्मवीर स्वराज्य-रक्षक एवं मुग़ल-प्रतिरोध सम्पूर्ण इतिहास)

छत्रपति संभाजी महाराज (धर्मवीर स्वराज्य-रक्षक एवं मुग़ल-प्रतिरोध सम्पूर्ण इतिहास)

Chhatrapati Sambhaji Maharaj Comprehensive Historical Biography

कमल गोखले / ऐतिहासिक शोध मण्डल द्वारा

DevanagariHindipublished793 पृष्ठ

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आर्थिक सहायता पहले से दी जा रही थी। खबर मिल चुकी थी कि औरंगजेब राजपूताना के युद्ध में उलझा हुआ है। इसलिए शम्भूराजा प्रसन्न मन और निर्द्वन्द्व भाव से यात्रा कर रहे थे। राजा गढ़ उतर कर 'पार' नामक गाँव में पहुँचे। उसी समय पोलादपुर की घाटी की ओर से सेना की एक टुकड़ी दौड़ती हुई आती दिखाई पड़ी। टुकड़ी के समीप आते ही सेना में खलबली मच गयी। आवाज आने लगी—'हिरोजी पकड़े गये। हिरोजी फर्जन्द को कैद हो गयी।' चिवलून में महाराज के सैनिकों ने हिरोजी फर्जन्द बन्दी बना लिया था। उनके द्वारा चुराकर ले जायी गयी रत्नों की पेटियाँ और बचा हुआ खजाना जब्त कर लिया गया था। अपराध बहुत बड़ा था। किन्तु अपराधी भी कोई सामान्य व्यक्ति न था। इसलिए सभी के सामने फर्जन्द की पेशी लेना टाल दिया। पार के पाटिल की कोठी में फर्जन्द को राजा के सामने प्रस्तुत किया गया। साठ वर्ष की उम्र पार किये हिरोजी फर्जन्द के रोबदार शरीर की ओर शम्भूमहाराज चकित होकर देख रहे थे। उनकी शंक्वाकार ठोड़ी, गरुड़ जैसी नाक, लम्बी सुघर दाढ़ी, शिवाजी महाराज की जैसी बड़ी-बड़ी सतेज आँखें। अपने पिता का स्मरण करते हुए स्तम्भित होकर संभाजी महाराज फर्जन्द की ओर देख रहे थे। हिरोजी के चेहरे पर तेज नहीं दिख रहा था। उनका गोरा-चिट्टा चेहरा अपराधबोध के कारण लज्जित था। शम्भूराजा के सामने एक शब्द भी बोलना उनके लिए असम्भव हो गया था। हिरोजी के मुँह से कोई शब्द निकले उसके पहले उनकी आँखें छलछला उठीं। उनका गला भर आया। वे बड़ी कठिनाई से बोले—"शम्भू बेटे! मरे हुए को अब और अधिक न मारो।" "हिरोजी फर्जन्द मेरे बहादुर चाचा। आपका कैसा नाम? आपकी कितनी ख्याति ? बुढ़ापे में आपको यह क्या सूझी ? पिताजी चले गये। हमें ममता से गले लगाने की जगह, मौके का लाभ उठाकर आप चोर उचक्कों की तरह खजाना लेकर भागे ? फर्जन्द चाचा आपने यदि अपनी इच्छा प्रकट की होती तो आपके चरणों में पूरा राजकोष निछावर कर देता। आपने यह चोर-उचक्कों की राह क्यों पकड़ी ?" पास के दालान में जाकर संभाजी ने अपने सहयोगियों के साथ विचार-विमर्श किया। महाराज ने कहा, "जाने दीजिए! जो कुछ हुआ उसे भूल जाएँगे। हिरोजी को क्षमा कर देंगे।" बीच में हस्तक्षेप करते हुए हंबीरराव ने कहा, "आपके मन का बड़प्पन हम सम्भाजी :: 203