छत्रपति संभाजी महाराज (धर्मवीर स्वराज्य-रक्षक एवं मुग़ल-प्रतिरोध सम्पूर्ण इतिहास)
Chhatrapati Sambhaji Maharaj Comprehensive Historical Biography
कमल गोखले / ऐतिहासिक शोध मण्डल द्वारा
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संदर्भ में पढ़ेंसान्त्वना दी। वे शिवाजी के वियोग में सूखकर काँटा हो गयी थीं। सोयराबाई की अपेक्षा शम्भूमहाराज को पुतलाबाई अधिक याद आती थीं। अपने पति के आकस्मिक निधन से बेचारी एकदम टूट गयी थीं। उसी बीच जब शम्भूमहाराज को मालूम हुआ कि वे अग्नि में प्रवेश कर सती होने जा रही हैं तो वे और भी अधिक चिन्तित हो गये। उन्हें स्मरण हो रहा था कि शहाजी महाराज की मृत्यु के बाद जब जीजा माता सती होने के लिए निकलने लगी तो उन्हें रोकने के लिए शिवाजी महाराज को कितना प्रयत्न करना पड़ा था। अचानक शम्भूराजा को प्रकांड पंडित गागाभट्ट की याद आ गयी। शिवाजी महाराज के राज्याभिषेक के समय भट्टजी के साथ उनकी अच्छी दोस्ती हो गयी थी। उस समय उन्होंने अनेक शास्त्रों और पुराण ग्रन्थों पर भट्टजी के साथ चर्चा की थी। बड़े महाराज से गागाभट्ट ने युवराज की तीक्ष्ण बुद्धि की बड़ी प्रशंसा की थी। इन्हीं बातों का स्मरण करते हुए उन्होंने कवि कलश का ध्यान आकर्षित किया। कविराज उस समय पुस्तकों को क्रमानुसार रख रहे थे। उन्होंने कहा, “कलशजी! गागाभट्ट को आज ही एक पत्र भेजिए! साथ ही एक हजार मुहरों की थैली भी।” “राजन्!” “हाँ कविराज! गागाभट्ट से हमें एक नया ग्रन्थ तैयार करवाना है। राजा को धर्म और नीति का पालन किस प्रकार करना चाहिए? इस विषय पर उनके जैसे अधिकारी विद्वान द्वारा लिखा गया ग्रन्थ हमारे लिए मार्गदर्शक होगा।” सूर्य अस्त होने को था। सन्ध्या काल की सुनहरी किरणें गढ़ पर चारों ओर बिखर गयीं। मशालें और चिराग प्रज्ज्वलित हो गये। शम्भूराजा का मन बहुत व्यग्र था। वे पुतलाबाई के महल की ओर निकले। पुतलाबाई सफेद वस्त्रों में शिवाजी महाराज के पलँग के पास बैठी थीं। पलँग पर महाराज की खड़ाऊँ, बैजन्ती माला, रेशमी कुर्ता, फूल और अगरबत्ती जैसी चीजें रखी हुई थीं। ये सभी चीजें भक्ति भाव से रखी थीं। शम्भूमहाराज पुतलाबाई के समीप गये। पुतलाबाई ने बड़े वत्सल भाव से उन्हें गले लगाया। उन्होंने हिचकियाँ लेते हुए राजा से पूछा, “शम्भू बेटे! मृत्यु ने इतनी जल्दी महाराज को क्यों निगल लिया? अभी उनकी उम्र ही क्या थी?” येसूबाई और शम्भूमहाराज ने पुतलाबाई को सान्त्वना दी। जैसे काली घटा के बरस जाने के बाद आसमान साफ हो जाता है उसी तरह पुतलाबाई भी आँसू पोंछकर प्रकृतिस्थ हो गयीं। वे बोलीं, “शम्भूराजा आप आ गये यह बहुत अच्छा हुआ। हम आपकी ही राह देख रहे थे। हमारी आँख आपकी ही ओर लगी थी। महाराज के चले जाने पर हमारे लिए यह दुनिया यह धन-दौलत व्यर्थ है। उनके साथ ही अपनी यह जीवन लीला समाप्त करने का निश्चय किया था। किन्तु दो कारणों से मुझे 208 :: सम्भाजी