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छत्रपति संभाजी महाराज (धर्मवीर स्वराज्य-रक्षक एवं मुग़ल-प्रतिरोध सम्पूर्ण इतिहास)

छत्रपति संभाजी महाराज (धर्मवीर स्वराज्य-रक्षक एवं मुग़ल-प्रतिरोध सम्पूर्ण इतिहास)

Chhatrapati Sambhaji Maharaj Comprehensive Historical Biography

कमल गोखले / ऐतिहासिक शोध मण्डल द्वारा

DevanagariHindipublished793 पृष्ठ

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रुकना पड़ा। एक तो यदि सती के वस्त्र मँगाने के लिए किसी कर्मचारी को बाहर बाजार भेजती तो महाराज की मृत्यु का समाचार बाहर फैल जाता।'' ‘‘माताजी! अब इस सारे दुख को भूल जाइए।’’ पुतळाबाई कहती रहीं-‘‘मेरे सती न होने का दूसरा कारण यह था कि राजाराम बेटे का विवाह हुआ और केवल सत्रह अठारह दिनों में ही हमारे ऊपर आसमान टूट पड़ा। अन्तिम दस-बारह दिनों में महाराज बेसुध ही रहे। अपनी आँखों को दीया बनाकर हम रात-दिन उनके पास ही बैठे रहे। एक रात महाराज को अचानक होश आया। उन्होंने मुझे समीप बुलाकर कहा -बातें सुनते-सुनते शम्भूमहाराज को रोमांच हो आया। येसूबाई और शम्भूराजा कान लगाकर सुनने लगे। पुतळाबाई अपने क्षीण स्वर में कह रही थीं- ‘‘महाराज ने अपने दुबले पतले हाथों में मेरा हाथ थामकर कहा-पुतला, मुझे नहीं लगता कि शम्भू बेटे से हमारी भेंट हो पाएगी। उन्हें हमारा सन्देश दे देना। कहना, 'शम्भू हम अपनी अन्तिम यात्रा पर निकल चुके हैं। जनता के आँसू और पसीने से खड़ा किया गया यह स्वराज्य, कष्ट उठाने वाले श्रमिकों का यह राज्य केवल आपके हाथों में सुरक्षित रह सकता है। इसका हमें पूरा यकीन है। मृत्यु से पूर्व यदि एक बार आपको सीने से लगाकर रो लेता तो उन आँसुओं में मन का सारा मैल धुल जाता और मैं धन्य हो जाता। यदि वह पापी औरंगजेब इस पुण्यभूमि पर आक्रमण करने आता है तो उसके पैरों में लोहे के नाल ठोंककर उसे हटाने की शक्ति, शम्भू बेटे केवल आपमें है। हम अल्पायु ठहरे किन्तु भगवान और भाग्य ने हमारे ललाट पर कीर्ति और वैभव का वन्दनवार सजाया है। जगदीश्वर से हमारी प्रार्थना है कि आपके साथ भी ऐसी ही ईश्वर-कृपा सदैव बनी रहे'।'' महाराज का यह अन्तिम सन्देश सुनकर शम्भूमहाराज अपने आँसू रोक नहीं पाये। उन्होंने महाराज के मुकुट और उनकी तलवार को सीने से लगाकर कहा, ‘‘माता जी! पिताजी के स्वास्थ्य के इतने बिगड़ने पर सन्देश तो भेजना चाहिए था।’’ ‘‘शम्भू बेटे! कैसे भेजती? हम विवश थे। उस समय यह राजधानी किसके क़ब्जे में थी। यह भी क्या कोई बताने की चीज है?’’ राजधानी में पहुँचते ही शम्भूमहाराज ने राजाराम को नजरबन्द रखने का आदेश दे दिया था। सोयराबाई के स्मरण मात्र से शम्भूमहाराज प्रक्षुब्ध हो जाते थे। दो-तीन दिन तक सोयराबाई के महल की ओर जाना उन्होंने टाल दिया। पुतळाबाई के त्यागी और सेवा धर्मी स्वभाव के सामने सोयराबाई का कुटिल और महत्त्वाकांक्षी स्वभाव और भी घृणास्पद लग रहा था। अचानक एक दिन संयम का बाँध टूट गया। सन्ध्या समय शम्भूमहाराज बड़ी शीघ्रता से सोयराबाई के महल की ओर निकले। सम्भाजी :: 209