छत्रपति संभाजी महाराज (धर्मवीर स्वराज्य-रक्षक एवं मुग़ल-प्रतिरोध सम्पूर्ण इतिहास)
Chhatrapati Sambhaji Maharaj Comprehensive Historical Biography
कमल गोखले / ऐतिहासिक शोध मण्डल द्वारा
पृष्ठ 212, कुल 793 में से
संदर्भ में पढ़ेंदरवाजे के पास ही तेजस्वी आँखों वाले दस वर्ष के कोमल स्वभाव वाले बालक राजाराम दिखाई पड़ गये। शम्भुराजा को देखते ही वे 'दादा साहबऽऽ' कहकर चिल्लाये। दोनों एक दूसरे मे मिलने के लिए आगे दौड़ पड़े। शम्भुराजा ने राजाराम को गले से लगा लिया। उनके गालों को बार-बार चूमा। तब रूठते हुए राजाराम ने कहा, "दादा साहब हम आपसे बहुत नाराज हैं।" "क्यों?" "हमारी शादी में आप नहीं आए।" बड़े दुखी स्वर में शम्भूमहाराज ने कहा, "बच्चे, मुझे निमन्त्रण नहीं दिया गया।" "घर के लोगों के लिए कैसा निमन्त्रण?" शम्भूमहाराज ने गम्भीर होकर कहा, "पन्हालगढ़ के हमारे दास-दासियों को भी तुम्हारी माताजी ने निमन्त्रित किया था। आखिर अपमान की भी कोई हद होती है। जाने दीजिए। जब बड़े हो जाओगे तो स्वयं ही सब कुछ समझ जाओगे।" प्रह्लाद निराजी के हाथ में राजाराम को देकर शम्भूमहाराज अकेले ही महल के भीतर दाखिल हुए। महल के दरवाजे पर महाराज की क्रुद्ध और उग्र मुद्रा देखकर दासियाँ और सेविकाएँ चिल्लाने लगीं। सोयराबाई पहले तो कुछ घबरायीं किन्तु तुरन्त अपनी अकड़ में खड़ी हो गयीं। शम्भूमहाराज सन्तप्त स्वर में बोले, "माताजी! पुत्र मोह में किसी व्यक्ति को कितना पागल होना चाहिए? आप भी इन स्वार्थी और अपना पेट पालने वाले कर्मचारियों के हाथ की कठपुतली बन गयीं?" सोयराबाई को अपने अपराधों का बोध हो गया था। अष्टप्रधानों के सहयोग मे उन्होंने इस षड्यन्त्र का दाव खेला था। अपने राजाराम के लिए उन्होंने संभाजी नाम की ज्वाला को स्वयं अपने ऊपर ओढ़ा था। अण्णाजी जैसे कर्मचारियों ने उस आग पर अपना पापड़ भूनने का खूब प्रयत्न किया था। पर अब वह आग उन्हीं पर उलट पड़ी थी। अपने हाथों से सोयराबाई को बैठने का संकेत करते हुए शम्भुराजा ने ऊँचे स्वर में कहा, "माताजी आपकी इच्छा हो या न हो, आपको अच्छा लगे या बुरा, मैंने तो अब राजमुकुट पहन लिया है। एक सामान्य शिष्टाचार के नाते आप मेरे स्वागत की शिष्टता दिखातीं? "स्वागत की आरती उतारने की अपेक्षा मुझसे क्यों करते हो? यहाँ आते ही सात-आठ लोगों को टकमक नोक से नीचे झोंक दिया। उनकी प्रेतात्माओं द्वारा किया जाने वाला स्वागत क्या पर्याप्त नहीं है?" सोयराबाई ने क्रोध से पूछा। "आप माँ हैं या दुश्मन? यह माँ का हृदय है या किसी पिशाचिनी का?" 210 : सम्भाजी