छत्रपति संभाजी महाराज (धर्मवीर स्वराज्य-रक्षक एवं मुग़ल-प्रतिरोध सम्पूर्ण इतिहास)
Chhatrapati Sambhaji Maharaj Comprehensive Historical Biography
कमल गोखले / ऐतिहासिक शोध मण्डल द्वारा
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संदर्भ में पढ़ें"संभाजी, आपका दिमाग है या गोला बारूद का भंडार? कितना गुस्सा करते हो? सारा विवेक ही भस्म कर देते हो। हिरोजी फर्जन्द जैसे वरिष्ठ और अनुभवी सरदार को भी आपने कैद में डाल दिया। उनकी आयु का उनके अनुभव का कुछ विचार किया क्या? सोयराबाई ने पूछा सच कहें तो फर्जन्द की लिंगाणा की कालकोठरी में हमेशा के लिए झोंक देना चाहिए था। अण्णाजी दत्तो और मोरोपन्त जैसे अपराधियों को पहले तोप के मुँह में डाल देना चाहिए था। किन्तु ऐसा कुछ न करके मैंने उन्हें उन्हीं के घरों में नजरबन्द कर दिया है। उनका कोई अपमान नहीं किया। माताजी ! अपने पिताजी से और कुछ भले ही न सीखा हो किन्तु राज्य व्यवहार में देशकाल परिम्स्थिति के अनुसार क्या करना चाहिए यह अच्छी तरह सीखा है।" शम्भूमहाराज के क्रोधावेश की पहली लहर चली गयी। तब सोयराबाई ने कहा, "आपने और आपके मूर्ख मित्रों ने चारों ओर मेरी बदनामी फैला रखी है। कहते हैं, मैंने महाराज को विष दिया और उसी से उनकी मृत्यु हुई।" सोयराबाई के आरोप से शम्भूमहाराज ने अपनी गर्दन झुका ली। उन्होंने कहा, "नहीं माता ऐसा आरोप आप पर किसी को भी नहीं लगाना चाहिए। आज भले ही पुत्र प्रेम ने आपको अन्धा बना दिया हो। पर आपका हृदय स्फटिक-सा शुभ्र और संवेदनशील है। इसका हमें अनुभव है। फिर भी मेरे प्रति द्वेष रखने के कारण आपके द्वारा किये गये अपराध क्षमा करने योग्य कतई नहीं हैं।" सोयराबाई घबरा गयी। शम्भुराजा के हाथ अभी भी थरथरा रहे थे। उनका मस्तक तप रहा था। वे अब क्रूरता के चरम शिखर पर पहुँच चुके थे। उन्होंने अपनी मुट्ठियाँ भींच लीं। इतने में उनकी दृष्टि पीछे की ओर गयी। वहाँ दरवाजे के पास बालक राजाराम घबराये हुए छिपकली की तरह दीवार से चिपके खड़े थे। यह देखकर जैसे पानी की धार से नमक पिघल जाता है वैसे ही शम्भूमहाराज द्रवित हो गये। उनके मस्तिष्क में उठा क्रोध का तूफान शान्त हो गया। शम्भुराजा आगे बढ़े और घबराये हुए राजाराम को अपने पास लेकर कहने लगे- "राजाराम, पिताजी के बाद ममता की छाया देनेवाला अब मेरे अतिरिक्त तुम्हारा है ही कौन ?" "दादा साहब, आप हमारी माताजी को बन्दी तो नहीं बनाएँगे न?" राजाराम ने पूछा। "आप दोनों पर पापी षड्यन्त्रकारियों की नजर न पड़े। आप लोगों का उपयोग कोई प्यादों के रूप में न करे। हमारी जान को कोई खतरा न पैदा हो। इसके लिए आप लोगों को हमें नजरबन्द तो रखना ही पड़ेगा। राजा के रूप में इतनी चिन्ता तो मुझे करनी ही पड़ेगी।" "दादा साहब, जैसी आपकी आज्ञा।" राजाराम ने कहा। संभाजी :: 211