छत्रपति संभाजी महाराज (धर्मवीर स्वराज्य-रक्षक एवं मुग़ल-प्रतिरोध सम्पूर्ण इतिहास)
Chhatrapati Sambhaji Maharaj Comprehensive Historical Biography
कमल गोखले / ऐतिहासिक शोध मण्डल द्वारा
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संदर्भ में पढ़ेंमाँ बेटे से विदा लेते हुए शम्भुराजा ने सोयराबाई से कहा, "माताजी, आज हम शपथ लेकर कहते हैं कि इसके बाद यह संभाजी छत्रपति शिवाजी महाराज द्वारा स्थापित लोक मर्यादा के अनुसार ही कार्य करेगा। प्रश्न केवल इतना ही है कि अब तक जो हुआ सो हुआ लेकिन इसके आगे आपका व्यवहार उस युग पुरुष की सह धर्मचारिणी जैसा होगा या नहीं?'' पाँच तीन हफ्ते सूखे पत्ते की तरह उड़ गये। माघ सुदी एकादशी के दिन शिवाजी महाराज के अस्थि कलश के साथ पुतलाबाई सती हो गयी। शम्भूमहाराज ने उन्हें इस निर्णय से विमुख करने का बहुत प्रयत्न किया। किन्तु उनके अटल निश्चय के आगे किसी की न चली। पुतलाबाई के सती हो जाने के बाद शम्भूमहाराज ने गढ़ पर बड़ा दान पुण्य किया। 20 जुलाई, 1680 को शम्भूमहाराज का सिंहासनारोहण होने वाला था। इसलिए राजधानी में सम्बन्धियों और मित्र परिवारों की बड़ी भीड़ एकत्र थी। शम्भुराजा की बड़ी बहन सखुबाई और महादजी निम्बालकर, अम्बिकाबाई और हरजी राजा महाड़िक की पालकियाँ अभी गढ़ से नीचे उतरी न थीं। गणोजी राजा शिर्के के परिवार का रूआब सबसे अधिक दिखाई दे रहा था। एक ओर शम्भुराजा की बहन राजकुँवरि गणोजी शिर्के की पत्नी थी तो दूसरी ओर गणोजी शिर्के येसूबाई के बड़े भाई थे। इस दुहरे सम्बन्ध के कारण गणोजी की साधारण बात को भी बड़ा महत्त्व मिल रहा था। शम्भुराजा ने प्रातःकाल स्नान किया और वैसे ही अधभीगे वस्त्रों में देवघर की ओर निकल पड़े। वहाँ पूजा की सामग्री तथा जैस्मिन एवं सोनजुही के सुगन्धित फूलों की टोकरी लिए येसूबाई खड़ी थीं। इतने सुन्दर प्रातःकाल में भी राजा की मुद्रा गम्भीर और खिन्न दिखाई पड़ रही थी। देवघर में प्रवेश करने से पूर्व ही वे येसूबाई से बोले, "येसू, इस मंगल और उत्सव के समय में बहन राणूबाई और दुर्गा की बहुत याद आ रही है। कैसी होंगी वे दोनों?'' राजा के काँपते स्वर को सुनकर येसूबाई का कलेजा भर आया। उन्होंने बड़े दुखी मन से कहा, "महाराज! आपकी तरह ही मेरी आँखें भी तरस रही हैं। उचित 212 :: सम्भाजी