छत्रपति संभाजी महाराज (धर्मवीर स्वराज्य-रक्षक एवं मुग़ल-प्रतिरोध सम्पूर्ण इतिहास)
Chhatrapati Sambhaji Maharaj Comprehensive Historical Biography
कमल गोखले / ऐतिहासिक शोध मण्डल द्वारा
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संदर्भ में पढ़ेंप्रह्लाद निराजी का चेहरा सूख गया था। वे बोले, "राजा को एक साथ अनेक समस्याओं का सामना करना पड़ता है। इसलिए अपने बहुत से कार्य दूसरे योग्य व्यक्तियों को सौंपने पड़ते हैं। बड़े महाराज कुछ जिम्मेदारियाँ दूसरों को सौंपते थे। कविराज ने उचित न्याय दिया या नहीं? प्रधान न्यायाधीश के नाते हम उसकी जाँच-पड़ताल करते हैं, उसके बाद ही उसकी तामील की जाती है। ऐसा महाराज का आदेश है, अण्णाजी पन्त।" "और प्रह्लाद पन्त क्या फिर आप वैसा ही करेंगे? याद है हम सभी अधिकारियों ने मिलकर विद्रोह किया था। हम सभी शम्भूराजा को पकड़ने के लिए पन्हाला गये थे किन्तु आप रात में हमसे अलग होकर पक्ष बदल लिए और हमें मुँह की खानी पड़ी।" अण्णाजी दत्तो बड़बड़ाये। "जाने दीजिए अण्णाजी, हम अधिक क्या कहें। आपके भले के लिए ही हम सारा प्रयास कर रहे हैं। उधर महारानी के पास आपके और हमारे लाभ के लिए प्रयास कर रहे हैं। सभी की कोशिश है कि हमें पहले जैसी प्रतिष्ठा प्राप्त हो।" "किस प्रतिष्ठा की बात लेकर बैठे हैं? इस बदनाम राजा और उसके लुच्चे मित्रों के समय में किस प्रकार के मान-सम्मान की अपेक्षा करते हैं आप? अनीति और अधर्म के अतिरिक्त अब रायगढ़ पर कुछ भी नहीं मिलने वाला है।" मोरोपन्त से अब रहा न गया, वे उठकर इधर-उधर देखते हुए दया भाव से बोले, "बस, अण्णाजी बस, हम आपके सामने हाथ जोड़ते हैं। अपनी ईर्ष्या की भयानक आग में हमें न जलाइए। बुढ़ापा आ गया है अब तक जो हुआ बहुत हो गया। चार दिन की जो जिन्दगी बची है उसे सुख से जीने दीजिए।" थके हुए मोरोपन्त ने अपने पुत्र निलीपन्त की ओर उड़ती नजर से देखा। तीन धर्म की मांगलिकता के प्रति शम्भूराजा के हृदय में जन्मजात आस्था थी। रायगढ़ की गद्दी पर बैठते ही उन्होंने एक एक निर्णय लेना आरम्भ कर दिया था। उन्होंने सन्त तुकाराम के सुपुत्र महादोबा को वार्षिक उत्सव का स्मरण दिलाया। एक करहाड़ क्षेत्र के लोग रायगढ़ पर आकर शिकायत करने लगे- "शम्भू महाराज! चाफल में स्वामी रामदास का बनवाया एक विशाल मन्दिर 226 सम्भाजी