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छत्रपति संभाजी महाराज (धर्मवीर स्वराज्य-रक्षक एवं मुग़ल-प्रतिरोध सम्पूर्ण इतिहास)

छत्रपति संभाजी महाराज (धर्मवीर स्वराज्य-रक्षक एवं मुग़ल-प्रतिरोध सम्पूर्ण इतिहास)

Chhatrapati Sambhaji Maharaj Comprehensive Historical Biography

कमल गोखले / ऐतिहासिक शोध मण्डल द्वारा

DevanagariHindipublished793 पृष्ठ

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मोरोपन्त पेशवा को अपनी बैठक में अण्णाजी और सोमाजी दत्तो का आना पसन्द नहीं था। क्योंकि अण्णाजी अतिमहत्त्वाकांक्षी और दुस्साहसी स्वभाव के कारण ही वे पिछले तीन महीने कारावास की सजा भोग चुके थे। अण्णाजी से रहा नहीं गया। उन्होंने वहाँ बैठे देवाजी से कहा, “जाओ देखकर आओ कि वहाँ दरबार में क्या चल रहा है?” बैठक में लौंग-सुपारी घुमाई जा रही थी। सामने ही बालेकिले की दीवार थी। उसी के पीछे अन्दर की ओर दरबार की कचहरी थी। देवबा दौड़ता हुआ गया और थोड़ी ही देर में लौटकर वापस आ गया। तब तक अण्णाजी बेचैन होकर उठे और पास के झूले पर जाकर बैठ गये। उनकी बेचैनी के साथ झूले की जंजीर भी कुर-कुर करके बजने लगी। सामने झुककर खड़े देवबा से उन्होंने पूछा—“क्यों रे लड़के, क्या चल रहा है वहाँ?” “न्याय का काम चल रहा जी! राजा के न्याय का काम।” “राजा का न्याय? अरे लेकिन शम्भूराजा तो दोपहर को ही किले से उतर कर नीचे चले गये हैं। ऐसा लोगों ने बताया है।” “राजा जब वहाँ है ही नहीं तो न्यायदान का कार्य कौन कर रहा है?” अण्णाजी ने पूछा। “अपने कवि कलुशा साहब जी।” “कहाँ? राजा की गद्दी पर?” “नहींऽ नहीं पन्त, आप भी कैसी बात करते हैं पन्त?” देवाजी ने कहा, “ऊपर जहाँ गद्दी है वहाँ से तीन सीढ़ी नीचे कविजी बैठे हैं। वे महाराज के सिंहासन पर कैसे बैठेंगे? राजा सिंहासन पर न भी बैठे हों तो भी राजसिंहासन को नमन किया जाता है जी।” “सिंहासन पर बैठें या न बैठें। राजा की ओर से न्याय तो आजकल कविराज ही देते हैं। लगता है आजकल फिर गंगा उल्टी बहने लगी है।” मोरोपन्त ने अण्णाजी की ओर घबराकर देखा, उसी समय प्रह्लाद निराजी वहाँ आ गये। उन्हें देखते ही अण्णाजी को जोश चढ़ गया। उन्होंने प्रह्लाद पन्त से पूछा— “क्यों प्रह्लाद पन्त? आजकल आपने न्यायाधीश का कार्य करना छोड़ दिया क्या? और बड़े महाराज के समय सिर पर चढ़ाया हुआ वह काजी हैदर हज की यात्रा पर चला गया क्या?” “अण्णाजी, क्या आपको खबर मिली?” “अजी वैसा कुछ नहीं है तो वह कन्नौजी कीड़ा कैसे अपनी चला रहा है और वह भी राजा के होते हुए।” 225