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छत्रपति संभाजी महाराज (धर्मवीर स्वराज्य-रक्षक एवं मुग़ल-प्रतिरोध सम्पूर्ण इतिहास)

छत्रपति संभाजी महाराज (धर्मवीर स्वराज्य-रक्षक एवं मुग़ल-प्रतिरोध सम्पूर्ण इतिहास)

Chhatrapati Sambhaji Maharaj Comprehensive Historical Biography

कमल गोखले / ऐतिहासिक शोध मण्डल द्वारा

DevanagariHindipublished793 पृष्ठ

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“अँ...हाँ भेंट हुई। इसके पहले के हमारे निवेदन के अनुसार उन्होंने नीति और धर्म से सम्बन्धित ‘समयनय’ नामक ग्रन्थ की रचना भी कर दी है। उसे उन्होंने खंडो बल्लाल के साथ हमारे पास भेज दिया है।” “राज्याभिषेक के समारोह में क्या वे सम्मिलित नहीं होंगे?” महारानी ने लड़खड़ाते हुए पूछा। “हाँ, उनकी तबीयत ठीक नहीं है।” येसूबाई और सखूबाई चुप थीं। किन्तु शम्भूराजा अपने आप को रोक नहीं सके। वे एक लम्बी साँस लेकर बोले, “रानीसाहब, हमारी अपेक्षा हमारे शत्रुओं की दौड़ बहुत तेज है। हम गागा भट्ट को निमन्त्रित करने वाले हैं, इसकी सूचना मिलते ही वे खंडोबा के पहले ही काशी पहुँच गये। हमारे शुभेच्छुओं गागाभट्ट का कान भरा—‘राज्याभिषेक शिवाजी के युवराज का है। किन्तु युवराज का व्यवहार और आचरण नीति-न्याय का नहीं है। चारों ओर घोर अधर्म फैला हुआ है, आदि-आदि।” येसूबाई ने डरकर कहा, “हाय राम?” ऐसी कडुई औषधि पीने की अब शम्भूराजा को आदत हो गयी थी। इसी समय जोत्याजी केसकर, दादाजी रघुनाथ देशपांडे, कृष्णाजी कंक जैसे मित्रों के दरबार में आने की सूचना रायप्पा ने दी। साथ ही येसाजी कंक, कोंडाजी बाबा फर्जन्द, केसोबा त्रिमल, म्हालोजी घोडपडे, हंबीरराव, मोहिते जैसे वरिष्ठ लोग भी आ पहुँचे। विचार विमर्श आरम्भ हुआ। अभी-अभी कुछ दिन पहले दिवंगत हुए मोरोपन्त पेशवा की चर्चा चल पड़ी। बहुत हल्की-सी बीमारी में वह पका हुआ फल डाली से गिर पड़ा। उन्हें स्मरण करते हुए संभाजी महाराज ने कहा, “पेशवा मन के बहुत अच्छे इन्सान थे। दूसरों के फन्दे में आकर उन्होंने जो बगावत की थी, उस भूल को उन्होंने अनेक बार मेरे सामने स्वीकार किया था।” “महाराज उनका यथायोग्य स्मारक बनना चाहिए।” हंबीरराव ने प्रस्ताव किया। “उनके ज्येष्ठ पुत्र निलोपन्त के गुणों को हमने अच्छी तरह परखा है। उन्हें पेशवा पद देने का हमने निश्चय कर लिया है।” शम्भूमहाराज ने सूचित किया। राजा का निर्णय सुनकर सभी बहुत प्रसन्न हुए। अपने की एक गाँठ खोलते हुए शम्भूमहाराज ने कहा— “येसाजी काका, कोंडाजी काका आप सभी को एक बात बताना आवश्यक लग रहा है। पिताजी के समय वरिष्ठ लोगों का मैं मान सम्मान नहीं करता, वरिष्ठ अधिकारियों से द्वेष रखता हूँ उनके साथ कपट का व्यवहार करता हूँ, ऐसा दूषित प्रचार करने में हमारे शत्रु बहुत सफल हो रहे हैं। उनका यह द्वेषपूर्ण प्रचार नासिक 228 सम्भाजी