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छत्रपति संभाजी महाराज (धर्मवीर स्वराज्य-रक्षक एवं मुग़ल-प्रतिरोध सम्पूर्ण इतिहास)

छत्रपति संभाजी महाराज (धर्मवीर स्वराज्य-रक्षक एवं मुग़ल-प्रतिरोध सम्पूर्ण इतिहास)

Chhatrapati Sambhaji Maharaj Comprehensive Historical Biography

कमल गोखले / ऐतिहासिक शोध मण्डल द्वारा

DevanagariHindipublished793 पृष्ठ

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अशुभ मोड़ एक आगरा और दिल्ली के बाद बुरहानपुर ही मुगलों का सर्वाधिक समृद्ध नगर था। दक्षिण का प्रवेशद्वार होने के कारण, मध्यकालीन भारत के सबसे बड़े व्यापार के रूप में उसकी ख्याति थी। यह सैनिक गतिविधियों की दृष्टि मे बड़े महत्त्व का स्थान था। इसलिए बुरहानपुर का सूबेदार बादशाह का कोई करीबी रिश्तेदार ही बनाया जाता था। खानजहान बहादुरखान बादशाह का दूधभाई था। इसीलिए उसकी नियुक्ति इस जिम्मेदारी के पद पर की गयी थी। बुरहानपुर से ही दक्षिण का शासन चलाया जा रहा था। तापी नदी के तट पर बसी यह ऐश्वर्यनगरी उस शाम को भी नित्य की भाँति आनन्द और विलास में डूबी थी। नदी के तट पर अनेक सुन्दर महल, राजप्रासाद व्यापारियों की बड़ी-बड़ी पीढ़ियाँ, मदरसे आदि विद्यमान थे। शहर के बीच में ऊँचे और मजबूत गुम्बदों वाली मस्जिद खड़ी थी। बहादुरखान कोकल्तास अपने भतीजी की शादी में सम्मिलित होने, चार दिन पहले औरंगाबाद चला गया था। उसका समधी भी हैदराबाद के नवाब का भाई था। बारात बड़ी धूमधाम से गोलकुंडा से आने वाली थी। अपनी शौकत में कमी न पड़े, इसके लिए बहादुरखान बहुत सचेत था। बुरहानपुर में नियुक्त आठ हजार फौजियों में से तीन हजार फौजी अपने साथ लेकर वह औरंगाबाद के लिए रवाना हुए। शाही विवाह में अपना प्रभाव दिखाने के लिए ही उसने अपने साथ फौज ली थी। उसके जाने के बाद नायबसूबेदार फाकरखान बुरहानपुर का सर्वेसर्वा था। जगह-जगह पर मशालें और बत्तियाँ जलाने का कार्य आरम्भ हुआ। तापी की धारा में उठने वाली तरंगें, रात के अन्धकार में लुप्त होने लगी थीं। शहर के सामने बहुत बड़ी दीवार थी। उसके साथ इधर हाल के दिनों में अनेक नयी बस्तियाँ बन गयी थीं। नवाबपुर, करणपुर, शाहजहाँपुर, खुर्रमपुर जैसे सम्भाजी :. 241