छत्रपति संभाजी महाराज (धर्मवीर स्वराज्य-रक्षक एवं मुग़ल-प्रतिरोध सम्पूर्ण इतिहास)
Chhatrapati Sambhaji Maharaj Comprehensive Historical Biography
कमल गोखले / ऐतिहासिक शोध मण्डल द्वारा
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संदर्भ में पढ़ेंकुल सत्रह 'पुर' बस गये थे। किन्तु इन सभी पुरों में बहादुरपुर सर्वाधिक समृद्ध 'पुर' के रूप में बहादुरपुर में सूरत और हैदराबाद जैसे शहरों के व्यापारी रहते थे। वहाँ रेशम, मलमल, सोना-चाँदी आदि के व्यापार में करोड़ों रुपयों का लेन-देन होता था। वैभव से भरी बुरहानपुर नगरी उस 30 जनवरी, 1681 की शाम बाहर से हमेशा की तरह ही लग रही थी। नायब सूबेदार काकरखान ने सन्ध्याकाल की नमाज पढ़ी। हिन्दू प्रजा के साथ किए गये दुर्व्यवहार के कारण वह बहुतों के रोष का कारण बन गया था। इसलिए दो सौ सशस्त्र सैनिक उसके बाड़े के बाहर हमेशा तैनात रहते थे। आज की दोपहर विशेष रूप से घटना प्रधान बन गयी थी। सूरत के सूबेदार की ओर से हरकारे आये थे। उन्होंने बताया कि सूरत के आसपास के जंगलों में वहाँ के ग्रामीणों ने अनेक मराठा घुड़सवारों को देखा है। इसलिए किसी भी क्षण सूरत पर मराठों का आक्रमण हो सकता है। इस आशंका से वहाँ की प्रजा बहुत भयभीत हो गयी है। विशेष रूप से गोदामों वाले विदेशी व्यापारी। इसके पूर्व पहली बार लगभग बीस वर्ष पहले और दूसरी बार बारह वर्ष पहले शिवाजी ने सूरत में लूटपाट की थी। अब ठीक बारह वर्ष बाद उनका बेटा सम्भाजी सूरत लूटेगा। इस कल्पना मात्र से लोगों की कँपकँपी छूट रही थी। सूरत के थानेदार ने बुरहानपुर से जितनी सम्भव हो उतनी सेना तत्काल भेजने की प्रार्थना की थी। सूरत की दूसरी लूट के बाद शहर के चारों ओर तीन पोरिसा ऊँची दीवार उठाई गयी थी। आवश्यकता से अधिक फौज भी वहाँ तैनात थी। किन्तु मराठों के आक्रमण के भय से यह सारा प्रयत्न वहाँ हो रहा था। काकरखान ने अपने सहयोगियों से विचार-विमर्श किया। अन्ततः केवल एक हजार फौज बुरहानपुर में रखकर शेष चार हजार की फौज और बड़ा तोपखाना दोपहर में ही सूरत के लिए रवाना कर दिया। सन्ध्या होने से पहले ही यह सेना पाँच कोस से आगे निकल गयी। काकरखान ने नमाज की चादर मोड़ी। उसी समय चार- पाँच गुप्तचरों के घोड़े उसके महल के सामने आकर खड़े हुए। दरवाजे के पास अपने घोड़ों को रोककर सवार नीचे उतरे। वे पसीने से तर दौड़ते हुए काकरखान के पास पहुँचे। वे घबराहट के स्वर में कहने लगे— "हुजूर, मरगट्टे बुरहानपुर तक पहुँच गये हैं। मरगट्टों ने आक्रमण कर दिया है, हुजूरऽऽ।" "क्या बकते हो? मरगट्टे और बुरहानपुर? पागलोऽऽ उनका लक्ष्य तो सूरत था...।" काकरखान चकरा गया। उसने सुराही को मुँह से लगाकर गटागट पानी पिया—"मरगट्टों का सिपाहसालार कौन है? वह सम्भा तो इतनी दूर आ नहीं 242 :: सम्भाजी