छत्रपति संभाजी महाराज (धर्मवीर स्वराज्य-रक्षक एवं मुग़ल-प्रतिरोध सम्पूर्ण इतिहास)
Chhatrapati Sambhaji Maharaj Comprehensive Historical Biography
कमल गोखले / ऐतिहासिक शोध मण्डल द्वारा
पृष्ठ 247, कुल 793 में से
संदर्भ में पढ़ेंएक बन्द पड़ी खंदक मिली। कभी-कभी उसमें शहर की सुरक्षा के लिए लकड़ियाँ जलाई जाती थीं। वह खंदक एक बार पार हुई तो सेना रास्ते पर आ जाती। किसी तरह काकरखान अपने पाँच-छः सौ सिपाहियों को लेकर उस अँधेरी खंदक के मुख तक आया। आसपास उसे कुछ हिलता-डुलता-सा दिखाई पड़ा। एकाएक खंदक की हजार-हजार जीभें फूट पड़ीं। उसके भीतर छुपे मराठों के घोड़े हिनहिनाते हुए बाहर निकले। 'हर हर महादेव', 'शिवाजी महाराज की जय', 'सम्भाजी महाराज की जय' चारों ओर यही उद्घोष गूँजने लगा। आसपास के अँधेरे में कुछ दूरी पर छिपे चार हजार घोड़े और भी बाहर आ गये। बुरहानपुर वासियों के सामने मौत दिखाई देने लगी। मराठे, 'मारोऽऽ, मारोऽऽ', चिल्लाते हुए उन पर हल्ला बोल रहे थे। उनके घोड़े आगे बढ़ रहे थे। उनके हाथ की भवानी तलवार 'गर्र-गर्र' घूम रही थी। सबसे आगे सम्भाजी महाराज का सफेद रंग का घोड़ा था। सम्भाजीराजा ने सिर पर लोहे का शिरस्त्राण और जाली वाला फौलादी कवच पहना था। वे सामने शत्रुओं के सिर उसी तरह छाँट रहे थे मानो ज्वार की बालें काट रहे हों। राजा के साथ युद्ध लड़ने का अवसर पाने के कारण उनके साथियों में भी बड़ा उत्साह आ गया था। वे बड़ी दृढ़ता से अपने घोड़ों को आगे बढ़ा रहे थे। भागते हुए बुरहानपुरी घोड़ों पर मराठी घोड़े टूट पड़ रहे थे। रक्त की धाराएँ बह निकलीं। बाढ़ के प्रवाह की तरह मराठी सेना बुरहानपुरी सेना का पीछा कर रही थी। काकरखान किसी तरह जान बचाकर दीवार के भीतर आया। चार-पाँच सौ घुड़सवार मारे जा चुके थे। अनेक मनुष्य और जानवर घायल होकर रास्ते में घिसट रहे थे। वे पीड़ा से चिल्ला रहे थे। 'या अल्लाहऽ, या खुदाऽऽ' कहकर हाथ-पैर पटक रहे थे। बुरहानपुर के ऐश्वर्य का पूरा नक्शा शम्भूराजा के मस्तिष्क में स्पष्ट रूप से अंकित था। इसीलिए उन्होंने काकरखान का पीछा न करके अपने मदमस्त घोड़े को दरवाजे पर ही रोक लिया। इसी समय घोड़ा दौड़ाते हुए कवि कलश राजा के पास पहुँचे। चिराग के उजाले में उन्होंने बुरहानपुर का कच्चा नक्शा शम्भूराजा को दिखाया। अपने को आश्वस्त करने के लिए आँखें घुमाते हुए शम्भूराजा ने कहा, "अपने दो तीन सौ लड़कों को यहाँ दरवाजे पर भिड़ा दो। लड़ाई का नाटक चालू रहने दो। बाकी सभी सामने के रास्ते से उस बहादुरपुर की ओर चलें। द्रव्यों से खचाखच भरी तिजोरियाँ और सन्दूकें वहीं हैं। चलिए रात में ही दुकानें तोड़ना शुरू कर दीजिए।" "जैसी आज्ञा, राजन।" "और हाँ, किसी स्त्री या बाल-बच्चे को हाथ नहीं लगाना है। ध्यान रखें कि कम से-कम जनहानि हो। किन्तु यदि कोई शस्त्र लेकर आक्रमण करता है तो उसे तुरन्त आसमान दिखा दीजिए।" सम्भाजी :: 245