छत्रपति संभाजी महाराज (धर्मवीर स्वराज्य-रक्षक एवं मुग़ल-प्रतिरोध सम्पूर्ण इतिहास)
Chhatrapati Sambhaji Maharaj Comprehensive Historical Biography
कमल गोखले / ऐतिहासिक शोध मण्डल द्वारा
पृष्ठ 248, कुल 793 में से
संदर्भ में पढ़ेंदो नींद में भी जाग कर सेनापति को अपना युद्ध धर्म पूरा करना पड़ता है। हंबीर मामा की फौज उस जंगल में विश्राम कर रही थी। किन्तु मामा अपने तम्बू में जाग रहे थे। मध्य रात्रि अँधेरे की काली चादर ओढ़े समाप्ति की प्रतीक्षा कर रही थी। इतने में कहीं दूर बुरहानपुर की ओर से 'हर हर महादेव', 'सम्भाजी महाराज की जय', 'शिवाजी महाराज की जय' ऐसी जोर की आवाजें सुनाई पड़ने लगीं। हंबीर मामा झटके से उठे, अपना कंबल सँभालते हुए बाहर आये। उसी समय उस रण गर्जना को सुनकर खेमे के सैनिक भाले तलवारें लिये मामा के पास इकट्ठे हो गये। सामने खड़े मराठा वीरों के उत्साह को देखकर हंबीरराव बोले, "बेवजह गड़बड़ मत करो। ये झूठे नारे दुश्मनों के हैं। उन्हें हमारे आने की खबर लग गयी होगी। इसीलिए वे होशियारी की चाल खेल रहे हैं। अपनी तलवारों को म्यानों में रखकर सब लोग हंबीर मामा के सामने चुपचाप खड़े थे। इसी समय दूसरी ओर से घोड़ों की टापें सुनाई देने लगीं। थोड़ी ही देर में गश्ती सेना के बारह घोड़े हंबीरराव के तम्बू के बाहर आकर खड़े हो गये। घुड़सवार दूर से ही चिल्लाने लगे-"मामा साहबऽऽ, मामा साहब शम्भू महाराज! अपने शम्भू महाराजऽऽ!!" "शम्भू महाराज? कहाँ? कैसे आएँगे शम्भू महाराज?" मामा ने आश्चर्य से पूछा। हम अपनी आँख से देखकर आये हैं। शम्भू महाराज ने वहाँ बुरहानपुर पर आक्रमण भी कर दिया है!" "हाँ मामा! राजा के साथ आये दो घुड़सवारों ने बताया कि शम्भुराजा ने पाँच दिन और पाँच रात लगातार दौड़ लगाई। चार हजार घोड़ों को लेकर इतनी दूर की दौड़ लगाई है मामा!" दूसरा कहने लगा। यह बात सुनते ही हंबीरराव के रोंगटे खड़े हो गये। उनके सिर और मूँछों के बाल खड़े हो गये। दूसरे ही क्षण 'हर हर महादेव' का जयघोष करते हुए, पन्द्रह हजार घोड़े बुरहानपुर की दिशा में दौड़ पड़े। रात में ही हंबीरराव की फौज शम्भुराजा की फौज से मिल गयी। बहादुरपुर लूटना आरम्भ हुआ। दुकानदारों के दरवाजे टूटे। तिजोरियों पर घन चलने लगे। तलघरों के जमीनी रास्ते खुलने लगे। शम्भुराजा और हंबीरराव ने पूरे परिवार की नाकेबन्दी कर दी थी। पुराने बुरहानपुर में लड़के जूझ रहे थे। वहाँ युद्ध का नाटक चल रहा था। करणपुर में अनेक सिख सरदार रहते थे। उनके मुगलों के साथ मिल जाने की सम्भावना थी। यह सूचना पाते ही मराठों ने करणपुर को घेर लिया। सिख सरदारों को निःशस्त्र कर 246 सम्भाजी