छत्रपति संभाजी महाराज (धर्मवीर स्वराज्य-रक्षक एवं मुग़ल-प्रतिरोध सम्पूर्ण इतिहास)
Chhatrapati Sambhaji Maharaj Comprehensive Historical Biography
कमल गोखले / ऐतिहासिक शोध मण्डल द्वारा
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संदर्भ में पढ़ेंक्षेत्र को जलाकर खाक कर दिया जाये। युद्ध क्षेत्र में अपना राजा सैनिकों के साथ आगे रहता है, इसकी सेना में बड़ी प्रशंसा होती थी। शम्भूराजा के राज्याभिषेक के एक पखवाड़े के भीतर ही उन्हें महत्त्वपूर्ण विजय का यश मिला था। इसलिए प्रजा ने शम्भूराजा और सेनापति की बहुत जय जयकार की। शम्भूराजा को इससे चिन्ता हुई। वे विनम्र स्वर में कहने लगे— “अभी तो शुरुआत है। अभी बहुत आगे जाना है। आप सभी बुजुर्ग एक और बात का ध्यान रखें। राज्य के क्रिया-कलाप को जिस प्रकार आप बुजुर्ग लोग अपना हक मानते हैं उसी प्रकार महत्त्वाकांक्षी और उत्साही तरुणों की आकांक्षाओं को बहुत दिन तक रोक पाना हमारे लिए सम्भव न होगा। आज रूपाजी भोसले, धनाजी जाधव, सन्ताजी घोडपड़े, निलोपन्त, कृष्णाजी कंक जैसे तरुणों और अनुभवी वरिष्ठों का एक समन्वित योग बनाकर हमें महाराष्ट्र धर्म की रचना करनी है।” “महाराज, औरंगजेब उत्तर में लाखों घोड़ों और मनुष्यों की सेना सागर तैयार कर रहा है। इससे स्पष्ट होता है कि उसके मन में कुछ खोट है।” बालाजी चिटणीस ने कहा। “यह शिवाजी का बालक शिवाजी का भी सवाई निकलेगा तब औरंगजेब को पता चलेगा।” हिरोजी फर्जन्द ने बड़े आत्मविश्वास से कहा। “फर्जन्द काका हम आपके सामने स्पष्ट कर देना चाहते हैं।” शम्भूराजा ने स्पष्ट शब्दों में कहा, “अपने पिता की तरह मैं कोई अवतारी पुरुष नहीं हूँ। वैसा कोई अपना चित्र भी बनाने मैं नहीं बैठूँगा। मेरे पिताजी का व्यक्तित्व हिमालय की भाँति भव्य और दिव्य था। शताब्दियों के बाद ऐसे पुण्यात्मा और गुणी महापुरुष पैदा होते हैं। इस हिमालय से मेरी तुलना करने के चक्कर में कभी न पड़ें। किन्तु मेरी धमनियों में प्रवहमान रक्त उसी महापुरुष का है, इसे भी न भूलें।” “महाराज!” सभी प्रमुख कर्मचारी भाव विह्वल होकर शम्भू महाराज की ओर देखते रह गये। “हाँ बालाजी काका और हिरोजी काका! इस स्वराज्य के मन्दिर पर चार अधिक स्वर्ण कलश लगाने की शक्ति देवताओं और भाग्य ने हमें न दी हो तो कोई बात नहीं परन्तु जब तक यह संभाजी जीवित है तब तक शिवाजी महाराज के इस हिन्दवी स्वराज्य के किसी किले को तो क्या, किसी चहारदीवारी की फूटी ईंट को भी उस पापी औरंगजेब को हस्तगत नहीं करने देंगे।” दरबार की बैठक समाप्त होने पर भी शम्भू महाराज वहीं रुके रहे। स्वराज्य के कोने कोने से आये सैनिकों से उनकी बातचीत चल रही थी। बालाजी चिटणीस महारानी के महल तक चलकर गये। उन्होंने महारानी से कहा, “आज दरबार में, आखिरी समय में शम्भू महाराज बहुत भावविभोर दिखाई दिये।” सम्भाजी :: 255