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छत्रपति संभाजी महाराज (धर्मवीर स्वराज्य-रक्षक एवं मुग़ल-प्रतिरोध सम्पूर्ण इतिहास)

छत्रपति संभाजी महाराज (धर्मवीर स्वराज्य-रक्षक एवं मुग़ल-प्रतिरोध सम्पूर्ण इतिहास)

Chhatrapati Sambhaji Maharaj Comprehensive Historical Biography

कमल गोखले / ऐतिहासिक शोध मण्डल द्वारा

DevanagariHindipublished793 पृष्ठ

पृष्ठ 258, कुल 793 में से

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"चलता है, शम्भू महाराज के हृदय का एक हिस्सा कठोर राजनीतिज्ञ का है तो दूसरा एक भावुक कवि का।" येसू रानी ने कहा। "क्या कह रही हैं बहू रानी?" "हाँ काका, जो केवल राजनीतिज्ञ होते हैं वे अपने स्वार्थों के गुलाम होते हैं। उनके लिबास के भीतर छिपी रक्तरंजित कटारें रहती हैं। इसलिए वे अपने स्वार्थ के अवसर पर पत्थर-से कठोर हो सकते हैं। किन्तु कवि का हृदय घास के गीले पत्ते जैसा होता है, इसीलिए किसी का छोटा दुख देखकर भी महाराज का हृदय द्रवीभूत हो उठता है।" चार कभी नहीं आते थे। किन्तु एक दिन दोपहर में शम्भू महाराज दरबार से लौट आये। वे अपने निजी कक्ष में विश्राम कर रहे थे। इसी समय एक सेवक अन्दर आया और अभिवादन करके कहने लगा—"कवि कलश बाहर आये हैं और तत्काल आपसे मिलना चाहते हैं।" शम्भुराजा की आज्ञा मिलते ही खिन्न मन कवि कलश हाथ झटकते हुए अन्दर आये। "राजन! अघटित घट गया, धोखा हुआऽऽ।" "हुआ क्या है? कविराज?" "जिसको हम एकनिष्ठता की मूर्ति और स्वराज्य का एक बलशाली बुर्ज समझते थे, वह बुर्ज ही ढह गया।" हताशा के साथ कविराज ने कहा। "साफ-साफ बताइए, क्या हुआ?" "अपने कोंडाजी फर्जन्द जंजीरावाले उस बदमाश सिद्दी से जाकर मिल गये।" "भाँग पिये व्यक्ति की तरह व्यर्थ में क्यों बड़बड़ा रहे हो? आपका दिमाग ठिकाने पर तो है न?" शम्भू महाराज कड़कती आवाज में पूछने लगे—"और किस फर्जन्द के विषय में बोल रहे हो? हिरोजी या कोंडाजी?" "दुर्भाग्य से कोंडाजी ही।" कलश गर्दन नीची कर ली। शम्भुराजा का चेहरा अचानक उतर गया उनकी समझ में कुछ नहीं आ रहा था। महारानी येसूबाई भी बहुत सम्भ्रमित थीं। उन्होंने अनेक बार अपने ससुर स्वयं 256 :: सम्भाजी

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