छत्रपति संभाजी महाराज (धर्मवीर स्वराज्य-रक्षक एवं मुग़ल-प्रतिरोध सम्पूर्ण इतिहास)
Chhatrapati Sambhaji Maharaj Comprehensive Historical Biography
कमल गोखले / ऐतिहासिक शोध मण्डल द्वारा
पृष्ठ 260, कुल 793 में से
संदर्भ में पढ़ेंअलग-अलग संस्थाएँ और संस्थाओं के कारण अलग-अलग जागीरदार मौज करते हैं और प्रजा की स्थिति बिगड़ती जाती है। राज्य की हानि होती है। मनुष्य तो क्या देवी-देवता के नाम पर भी जागीर नहीं देनी चाहिए। पुजारियों को बिगाड़ना नहीं चाहिए।" "किन्तु राजन, आगे भी सारे जागीरदार यह प्रश्न मुझसे पूछते रहेंगे, उन्हें हम क्या उत्तर दें?" "उनसे साफ-साफ कह दीजिए-चाहिए तो जागीर के बदले मेरे हाथ-पैर के टुकड़े माँग लें, हम प्रसन्नता से दे देंगे किन्तु मेरी आखिरी साँस तक मुझसे जागीरदारी की आशा न करें।" कोंडाजी की गद्दारी का घाव शम्भू महाराज के मन में बैठ गया था। मराठों और सिद्दियों की शत्रुता को नयी धार मिलने वाली थी। उन्होंने शीघ्रता से निलोपन्त पेशवा को आदेश दिया- "निलोबा पानी के ऊपर कभी भी युद्ध आरम्भ हो सकता है। अपनी ओर से पूरी तैयार रखिए।" "जी महाराज।" कुलाबा और सागरी किलों पर आवश्यक धान्य भंडार, गोला-बारूद है कि नहीं, इसकी पुष्टि कीजिए। यदि रसद की कमी हो तो उसकी दुगुनी भेजिए। वह सिद्दी और उसके आश्रयदाता अँग्रेज स्वराज्य पर चढ़ आये तो अनर्थ हो जाएगा। उसके लिए समुद्र के किनारे के बुर्जों पर शत्रु की टोह लेते रहने की चौकस तैयारी कीजिए।" "बड़े महाराज की दृष्टि भी बड़ी थी, महाराज।" निलोपन्त पेशवा कहने लगे- "उन्होंने मृत्यु से दो वर्ष पूर्व ही कुलाबा का किला बनवाया था।" "लेकिन कुलाबा की तटबन्दी का काम अभी बाकी है। अजोजी यादव को शीघ्र ही वहाँ भिजवाइए। चार महीने के भीतर वहाँ की तटबन्दी तैयार हो जानी चाहिए।" "जैसी आज्ञा, महाराज।" उस रात शम्भू महाराज देर तक जागते रहे। अप्रसन्न मनःस्थिति में भी उनके चेहरे पर किंचित हँसी आयी। यह देखकर येसूबाई पूछने लगीं-"महाराज बीच में वह क्या?" "येसू, मुझे अपने बचपन की एक घटना स्मरण हो आयी। पुरन्दर के समझौते में पिताजी ने तेईस किले मुगलों को देने के लिए स्वीकार किया था। उस समझौते पर हस्ताक्षर करके हमारे पिताजी वापस लौटे थे। तब उनके भी चेहरे पर ऐसी ही हँसी आयी थी। इस पर जीजामाता नाराज हो गयीं। वे पिताजी से कहने लगीं-शिवबा एक रायगढ़ छोड़कर अपने सभी बलशाली किले गँवाकर आ गये 258 : सम्भाजी