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छत्रपति संभाजी महाराज (धर्मवीर स्वराज्य-रक्षक एवं मुग़ल-प्रतिरोध सम्पूर्ण इतिहास)

छत्रपति संभाजी महाराज (धर्मवीर स्वराज्य-रक्षक एवं मुग़ल-प्रतिरोध सम्पूर्ण इतिहास)

Chhatrapati Sambhaji Maharaj Comprehensive Historical Biography

कमल गोखले / ऐतिहासिक शोध मण्डल द्वारा

DevanagariHindipublished793 पृष्ठ

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"किन्तु महाराज ?" "रहने दीजिए। आप जो कहने वाले हैं वह मुझे पता है। किन्तु नीलोपन्त ! इन लोगों के विचार उत्तम हैं, उद्देश्य पवित्र हैं। अपनी प्रजा के उत्साह का सम्मान हम नहीं करेंगे तो और कौन करेगा ?" सरकारी तिजोरी में जमा करते समय कर के रूप में वसूली गयी राशि में कमी आती है। कुछ कर्मचारी कर वसूलते समय प्रजा को सताते हैं, ऐसी शिकायतें महाराज के पास आ रही थीं। इसीलिए महाराज ने इस विभाग का अनुशासन बहुत कड़ा कर दिया था। उस विभाग के कामगारों से लेकर राजधानी के प्रधान कर्मचारी तक की जाँच हो रही थी। बालाजी चिटणीस तो मुख्य रूप से जाँच का ही कार्य कर रहे थे। स्वयं महारानी येसूबाई और कवि कलश दिन-दिन भर दरबार में बैठकर बारीकी से जाँच-पड़ताल कर रहे थे। इस जाँच कार्य के आरम्भ होते ही अण्णाजी दत्तो बहुत बेचैन हो गये। उनके भाई सोमाजी बोले, "जाने दो दादा ! इतनी चिन्ता क्यों करते हो ?" "तू गधा है ! तुझे क्या पता कि यह सब क्यों हो रहा है ? इधर के और विशेष रूप से कोंकण विभाग के बहुत से कर्मचारियों को मैंने नियुक्त करवाया है। ये सभी हमारे परिवार के व्यक्ति के समान हमारे स्नेही हैं। इसीलिए तो उनके बारे में ऐसी छानबीन की जा रही है।" "भाई साहब ऐसा हो रहा है तो ठीक नहीं है।" सोमाजी ने कहा। "सच है ! अन्य अष्टप्रधानों को बगावत करने के बाद भी उनके पुराने पद दे दिये गये। केवल मुझे ही सुरनवीसी नहीं दी गयी। केवल मजूमदारी से सन्तोष करना पड़ा। फिर भी हम कहीं चूकते हैं क्या ? इसके लिए यह सारी छानबीन ? अब अच्छे लोगों के लिए रायगढ़ पर अच्छे दिन नहीं रहे, सोमाजी अब यही सच है।" अण्णाजी पर हो रहे घोर अन्याय से सोमाजी बहुत क्रुद्ध हो गये। एक दिन दरबार में महाराज, महारानी और चिटणीस नहीं थे। केवल निचले कुछ कर्मचारी और कविराज थे। यह देखते ही सोमाजी दत्तो से रहा नहीं गया। वे झट से कविराज के समीप पहुँच गये। वह कुछ व्यंग्य और कुछ दम देने जैसे स्वर में बोले, "क्यों कविराज ! यहाँ दक्षिण में आकर हमारे धर्म-कर्म में गड़बड़ करने के लिए आपसे किसने कहा है ?" "कैसी गड़बड़, मेरी समझ में नहीं आया ?" कविराज ने कहा। वह श्रीबाग के कोल्हटकर और रसूल के यवनों का प्रसंग ! आप उन धर्मभ्रष्टों को हिन्दू धर्म में मिलाने जा रहे हैं?" "उसमें कौन-सी गड़बड़ है ?" कवि कलश ने कहा, "उन गरीब ब्राह्मणों की माँग है कि उन्हें पुनः हिन्दू धर्म में सम्मिलित किया जाये। इसीलिए वे सब रायगढ़ पर आये थे। ये सारी बात महाराज को बता दी गयी है।" 262 :: सम्भाजी