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छत्रपति संभाजी महाराज (धर्मवीर स्वराज्य-रक्षक एवं मुग़ल-प्रतिरोध सम्पूर्ण इतिहास)

छत्रपति संभाजी महाराज (धर्मवीर स्वराज्य-रक्षक एवं मुग़ल-प्रतिरोध सम्पूर्ण इतिहास)

Chhatrapati Sambhaji Maharaj Comprehensive Historical Biography

कमल गोखले / ऐतिहासिक शोध मण्डल द्वारा

DevanagariHindipublished793 पृष्ठ

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दिन काट रहा था। वह एक चौबीस वर्ष का तरुण था। एक मध्यम ऊँचाई का चुस्त दुरुस्त, सुदर्शन शहजादा। अभी उसके गले में मोतियों की माला उसी तरह चमक रही थी। दिल्ली के मीना बाजार में शाही दर्जी द्वारा किया गया उसका मखमली लिबास अभी भी उसके शरीर पर था। किन्तु उसका मन भीतर ही भीतर रो रहा था। जो औरंगजेब खजाने के हीरे जवाहरात खुले हाथ लुटाता था, उसी औरंगजेब का लाड़ला शहजादा अकबर दक्षिण में पागलों की तरह भटक रहा था। औरंगजेब के लाड़ले शहजादे के रूप में जब वह आरामदेह नरम बिस्तर में लेटता था और पक्षियों की तरह अपनी आँखें धीरे-धीरे खोलता था तब उसके आदेश की प्रतीक्षा में सैकड़ों सुन्दर दासियाँ खड़ी रहती थीं। उसके शरीर की मालिश करने वाली पीली आँखों वाली कमनीय तिलोत्तमाएँ थीं। शहजादे के तैरने के लिए स्वच्छ नीले पानी का सरोवर था। थोड़ी भी थकान या शिथिलता आने पर उसका मन बहलाने के लिए मदमस्त लखनवी नृत्यांगनाएँ, स्वर्गीय संगीत की लहरें, खुशमिज़ाज मसखरों और विदूषकों की हास्य की बहारें, वह सुख का स्वर्ग कहाँ चला गया ? औरंगजेब के दरबार में नृत्य-संगीत, गायन वादन आदि पर प्रतिबन्ध था। किन्तु शहजादे अकबर के दीवानखाने और दिल में प्रवेश करने के रास्ते नृत्यांगनाएं और उनके साजिन्दे खोज ही लेते थे। शहजादा आजम, मुअज्जम और कामबख्श की अपेक्षा औरंगजेब को अकबर से अधिक प्रेम था। इसलिए भावी शहंशाह के रूप में लोग उसी का अनुमान लगाते थे और उसी के अनुरूप उसका आदर करते थे। बड़े-बड़े राजपूत, तुर्क, अफगान सरदार उसके आगे सिर झुकाते थे। शहजादे की उम्र अभी लगभग दो महीने की ही रही होगी कि उसकी माँ दिल्लाराम बानू अल्लाह को प्यारी हो गयी। अपनी लाडली बेगम के आकस्मिक निधन से बादशाह बहुत दुखी हुआ। जिस प्रकार चिड़िया अपने घोंसले में लाड़-प्यार से बच्चे को पालती है, उसी प्रकार औरंगजेब ने इस नवजात शिशु को हृदय से लगा लिया। आज उसी शहजादे की सुबह एक अजीबोगरीब गाँव में भेड़-बकरियों की 'बेंऽऽ बेंऽऽ' की आवाजों के साथ हो रहा था। पहले वह अपनी गजदन्ती खिड़कियों से मस्जिद की ऊँची मीनारें और राजमहल की भव्य मेहराबें देखा करता था। परन्तु अब सुभाग पाली के परिसर में इस अपरिचित घने जंगल को देखते हुए उसका मन कुछ विचित्र-सा हो रहा था। जब वह शहजादा अपने पिता के साथ अभियान पर निकलता था तो उसकी और शाहंशाह की जनानियों का खेमा तीन मील में फैला रहता था। किन्तु अब वह घास-फूस से बने एक घर में किसी प्रकार दिन काट रहा था। उसमें घर के चारों ओर कूड़ा-करकट था और घर के भीतर 272 संभाजी