भारतकोश
छत्रपति संभाजी महाराज (धर्मवीर स्वराज्य-रक्षक एवं मुग़ल-प्रतिरोध सम्पूर्ण इतिहास)

छत्रपति संभाजी महाराज (धर्मवीर स्वराज्य-रक्षक एवं मुग़ल-प्रतिरोध सम्पूर्ण इतिहास)

Chhatrapati Sambhaji Maharaj Comprehensive Historical Biography

कमल गोखले / ऐतिहासिक शोध मण्डल द्वारा

DevanagariHindipublished793 पृष्ठ

पृष्ठ 275, कुल 793 में से

संदर्भ में पढ़ें
पृष्ठ 275

केलिको के पर्दे लगे थे। बैठने के लिए एक जाजिम था। शहजादा अकबर के साथ उत्तर से चार सौ घोड़े, थोड़े से पैदल और ढाई सौ ऊँट आये थे। यह छोटा सा दल दिल्ली के बादशाह के शहजादे को नहीं किसी गुमाई को ही शोभा दे सकता था। इस परिसर ने शहजादे का मन खराब कर दिया था। जब वह पाली के पास आया तब उसका स्वागत रिमझिम बरसात ने किया था। बरसात के रुकने पर झुके हुए बादल उसे बेचैन कर देते थे। अनेक बार पड़ोसी के बच्चों की तरह बादल उसके घर में घुस आते थे। पन्द्रह पन्द्रह दिन तक सूर्य के दर्शन ही नहीं होते थे। कड़ाके की ठंड और तेज हवा थी। बिच्छू और साँप भी वहाँ थे। इन सब चीजों से शहजादे का जीना हराम हो गया था। वहाँ रहते कुछ महीने बीत गये थे। शहजादे ने संभाजी महाराज से निवेदन भी किया था। पत्र पर पत्र भेजे थे। परन्तु रायगढ़ से मिलने वाले उदासीन प्रतिसाद से अकबर बहुत बेचैन हो गया। आज शहजादे की स्थिति बहुत खराब हो गयी थी। उत्तर से साथ आये दुर्गादास पर वह एकदम उखड़ गया—“दुर्गादास, यह न भूलिए कि मैं हिन्दुस्तान का बादशाह हूँ। मैं उस संभाजी से बहुत असन्तुष्ट हूँ। अपना सारा काम छोड़कर उसे मुझे सलाम करने के लिए भागते हुए यहाँ आना चाहिए था। अभी कल तक सोच रहा था कि जब मैं दिल्ली का बादशाह बनूँगा तो दक्षिण की सूबेदारी शम्भू को दूँगा। पर अब यह नहीं होगा। यदि आप सिफारिश करेंगे तो भी सम्भव नहीं है।" बहुत देर से दुर्गादास अपनी हँसी रोकने का प्रयास कर रहे थे। शहजादा अकबर ने कहा, "दुर्गादास, ऐसी बेअदबी आपको शोभा नहीं देती।" शहजादे के रोष की चिन्ता न करते हुए दुर्गादास ने कहा, "यदि किसी के पास तख्त, ताज, जमीन और प्रजा न हो तो नौटंकी के नकली बादशाह जितनी भी उसकी इज्जत नहीं होती। शहजादे आज का यथार्थ क्या है? इसको समझना आवश्यक है।" "लेकिन वह दुष्ट संभाजी तो हमारी ओर ध्यान देने के लिए तैयार ही नहीं है।" "और कितना ध्यान दें? आपके स्वागत के लिए मराठी राज्य के वरिष्ठ वकील और संभाजी के प्रतिनिधि के रूप में हिरोजी फर्जन्द स्वयं यहाँ आये थे। हीरों जड़ा कंठहार, आपकी टोपी के लिए रत्न कलंगी और विविध प्रकार के जवाहरातों का कितना मूल्यवान उपहार उन्होंने आपको भेंट किया। आपकी सुरक्षा के लिए उन्होंने पाँच सौ सैनिकों की सेना दी है। एक राजा ने दूसरे राजा के साथ राजा जैसा ही बर्ताव किया है। शहजादे, आपको और क्या चाहिए?" शहजादा अकबर बिफर कर बोला, "आजकल मेरी इस फूटी तकदीर को क्या हो गया है? यही नहीं समझ में आ रहा है।" "शहजादे, दूसरों को दोष देने की जगह अपनी निष्क्रियता और विलासी सम्भाजी :: 273