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छत्रपति संभाजी महाराज (धर्मवीर स्वराज्य-रक्षक एवं मुग़ल-प्रतिरोध सम्पूर्ण इतिहास)

छत्रपति संभाजी महाराज (धर्मवीर स्वराज्य-रक्षक एवं मुग़ल-प्रतिरोध सम्पूर्ण इतिहास)

Chhatrapati Sambhaji Maharaj Comprehensive Historical Biography

कमल गोखले / ऐतिहासिक शोध मण्डल द्वारा

DevanagariHindipublished793 पृष्ठ

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बुलाया ही न? माफ कीजिए अन्नदाता के सम्बन्ध में बोलते समय जबान भारी हो जाती है—पर हिन्दू धर्म की अस्तित्व रक्षा का प्रश्न बहुत महत्त्वपूर्ण है। बड़े महाराज बस वही एक भूल हुई थी किन्तु उनके चिरंजीव ने तो उस गोड़ बंगाली शाक्तपन्थी भड़भूजे को सिर पर चढ़ा रखा है। उसका महत्त्व दिनोंदिन इतना बढ़ने लगा है कि वैदिक ब्राह्मण को भविष्य में यहाँ आश्रय ही नहीं मिल पाएगा। अण्णाजी की बातों से दरबार का रुख ही बदल गया। निलोपन्त पेशवा अत्यन्त चिन्तित होकर उनकी ओर देखने लगे। उनके कान क्रोध से लाल हो गये। अण्णाजी ने गरजते हुए कहा, “कहो तो हम लिखकर देते हैं कि इस राजा की वजह से हमारा धर्म और हमारे देवता संकटग्रस्त हैं क्यों निलोपन्त ? अण्णाजी ने ऊँची आवाज में फिर कहा, “इस तरह मेरी ओर क्या देख रहे हो? यदि आपके पिता मोरोपन्त इस समय यहाँ होते तो शान्त बैठे रहते?” निलोपन्त को यह प्रश्न अच्छा नहीं लगा। वे क्रोध के आवेश में बोले— “मुजूमदार अपने ही धर्मबन्धु हैं। उन्हें परधर्मियों ने डुबाया। अपने भाई होकर वे न्याय के लिए ‘कलश’ के दरवाजे पर क्यों जाते हैं? इसमें तो आपकी पराजय है।” “क्यों जाता है ?” “इसलिए कि आपकी दक्षिणा इतनी अधिक है। कपोलकल्पित पाप के प्रक्षालन के मुकाबले इतनी अधिक है कि लोगों को धर्म की अपेक्षा मरना बेहतर लगता है।” “निलोबा, तुम बहुत अधिक बोल रहे हो।” “झूठ तो नहीं बोल रहा हूँ न? राज्य के साढ़े तीन सौ किलों पर जो कायस्थ, ब्राह्मण और मराठा अधिकारी थे और जो शिवाजी महाराज के समय से चले आ रहे थे उनमें शम्भूराजा ने कोई बदलाव किया? उनके आसपास जैसे सेना में मुसलमान हैं, वैसे प्रशासन में ब्राह्मण हैं, किले पर प्रभु हैं, वतनदसि में पहले की तरह बन्दी हैं। महाराज से केवल एक ही भूल हुई है।” निलोपन्त सभी की ओर अपनी दृष्टि घुमाते हुए बोले, “राजद्रोह जैसे भयानक गुनाह करने पर भी राजा ने आप पर दया दिखाई, फिर से पद पर आसीन किया। आपको प्रतिष्ठा दी। यही उनका दोष है।” किसी की प्रतिक्रिया की प्रतीक्षा किये बिना निलोपन्त वहाँ से उठ कर चले गये। उनके चले जाने से अण्णाजी ने राहत महसूस की। उन्होंने अपने लम्बे गमछे से गंजे सिर पर पड़े धर्म के छींटों को पोंछ डाला। शम्भूराजा जब से सिंहासनारूढ़ हुए तभी से हिरोजी के मन में एक चिन्ता घर कर गयी थी। राहुजी सोमनाथ फर्जन्द ने उनसे बहुत पहले कहा था—‘‘हिरोजी। सम्भाजी 277