छत्रपति संभाजी महाराज (धर्मवीर स्वराज्य-रक्षक एवं मुग़ल-प्रतिरोध सम्पूर्ण इतिहास)
Chhatrapati Sambhaji Maharaj Comprehensive Historical Biography
कमल गोखले / ऐतिहासिक शोध मण्डल द्वारा
पृष्ठ 286, कुल 793 में से
संदर्भ में पढ़ेंकवि कलश को अधिक प्रतीक्षा न करवाकर सम्भाजी ने सीधा प्रश्न किया— "कविराज, यदि कोई सामान्य कर्मचारी या लेखक राजद्रोह का अपराध करे तो धर्मशास्त्र के अनुसार उसे क्या दंड मिलना चाहिए?" "राजन, ऐसे गुनाह के लिए देहान्त प्रायश्चित के अतिरिक्त दूसरा कोई दंड धर्मशास्त्र में नहीं है।" "और यदि यह अपराध किसी प्रधान या मन्त्री ने किया हो तो?" राजा ने कविराज की ओर घूरते हुए देखा। शम्भुराजा के दूसरे प्रश्न से कविराज एकदम चौंक गये। धर्मशास्त्र के जटिल नियमों को बताते हुए उन्होंने कहा— "कोई गरीब सेवक थोड़े से लोभ के कारण दुर्भाग्यवश ऐसे अपराध में फँस सकता है। राजा के विवेक के कारण ऐसा व्यक्ति दया का पात्र भी हो सकता है। किन्तु शत्रु के साथ मैत्री करने वाला व्यक्ति बहुत घातक होता है। शत्रु से हाथ मिलाने वाला व्यक्ति प्रधानमन्त्री या उनके स्तर का अधिकारी हो तो यह भयानक दायित्वहीनता होती है। ऐसे व्यक्ति की यदि राजा ने कठोर से कठोर दंड न दिया तो राजा और खेत में खड़े किए गये बिजूका में कोई अन्तर ही नहीं रहेगा।" अपने द्वारा दिये गये उत्तर से कविराज स्वयं चौंक गये। किन्तु शम्भुराजा उनसे नाराज नहीं हुए। उन्हें झेंप आ रही थी। वे दुविधा में पड़ गये कि अगला प्रश्न पूछें या न पूछें? फिर भी उन्होंने पूछा— "मान लीजिए बाल-बच्चों का विचार करके किसी प्रधान को इस प्रकार के अपराध के लिए एक बार क्षमा कर दिया, फिर भी उसी प्रधान ने इसी प्रकार के अपराध की पुनरावृत्ति की तो?" "तो- ? राजा यदि इस प्रकार रोज क्षमादान की मिठाई बाँटता रहेगा तो उस राजा को राज्य का कार्य भार छोड़कर पशुओं को सँभालना अधिक अच्छा होगा।" राजा से बात करते-करते कविराज सावधान हुए। पीछे शीशे के खम्भे के समीप एक ऊँचे कद का गजपूत खड़ा था। उसकी छँटी हुई दाढ़ी और महीन जालीदार कुर्ता-उसके व्यक्तित्व को अलग गरिमा प्रदान कर रहे थे। कविराज से उसका परिचय कराते हुए शम्भुराजा ने कहा— "यह गौरव सिंह हैं।" "कहाँ से आये?" "पाली के जंगल से। शहजादा अकबर और दुर्गादास राठौड़ ने विशेष रूप से इन्हें यहाँ भेजा है।" कविकलग्र आगे के आदेश की प्रतीक्षा में खड़े रहे। उसी समय शम्भुराजा ने ग्लानिग्रस्त स्वर में कहा— 284 :: सम्भाजी