छत्रपति संभाजी महाराज (धर्मवीर स्वराज्य-रक्षक एवं मुग़ल-प्रतिरोध सम्पूर्ण इतिहास)
Chhatrapati Sambhaji Maharaj Comprehensive Historical Biography
कमल गोखले / ऐतिहासिक शोध मण्डल द्वारा
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संदर्भ में पढ़ेंसे चाहेंगे तो इन दोनों को अवश्य नष्ट कर देंगे। इस समय तो आप इस दुष्ट राजा को जीवित पकड़ें या उसकी हत्या करें, पर हमें मुक्ति दिलाएँ। उसके बदले में हम अपना आधा राज्य आपके कदमों में सौंपने को तैयार हैं। अन्त में हम यही चाहते हैं कि बालक राजाराम, महारानी सोयराबाई और हम कर्मचारियों को अपनी जगह तथा गरीब ब्राह्मणों एवं नेक मराठों को अपनी पूर्व सम्पदा के साथ उनका वतन वापस मिल जाये। हे दिल्लीपति! कुछ भी करके हमारे इस संकटकाल में दौड़कर आइए। सम्भाजी की कैद से हमें बचाइए। बाकी देन-लेन की बात बाद में मिलने पर निश्चित करेंगे। कवि कलश ने एक साँस में उस पत्र को दो बार पढ़ लिया और आगे के आदेश की प्रतीक्षा करने लगे। राजा ने कहा— "उस शहजादे को सुबुद्धि आयी तभी तो यह गुप्त पत्र हमारे पास तक आ सका।" "ये षड्यन्त्रकारी हैं कहाँ? कहीं भाग तो नहीं गये?'' कविराज ने चिन्ता प्रकट की। "नहीं, नहीं, शहजादे ने उनसे मीठी मीठी बातें करके उन्हें सुधागढ़ के महल में रोक रखा है।" "और सोयराबाई कहाँ है? महारानी?" "वे रायगढ़ पर ही रुकी हैं। यदि यह योजना असफल हो गयी तो अपने को निर्दोष सिद्ध करने के लिए कहेंगी इसमें उनका कोई हाथ नहीं है।" शम्भूराजा के सिर में पीड़ा उठ गयी थी। राज्य में ऐसी कोई घटना नहीं घटी थी कि कर्मचारी इस प्रकार प्राण के भूखे हो जाएँ, इतनी भयंकर योजना बनाएँ। पिछले वर्ष सम्भाजी ने राज्य का कार्यभार बहुत अच्छी तरह सँभाला था। कर्मचारियों के अपराधों को क्षमा करके उन्हें उनके पद वापस दे दिये थे। क्रोध से अपनी मुट्ठी बगल के खम्भे पर मारते हुए शम्भूराजा ने कहा— "कविराज देखिए! आँखें फाड़कर देखिए। हस्ताक्षर पहचाना? बताइए! इस पत्र पर किसके हस्ताक्षर हैं?" "चिटणीस का हस्ताक्षर है।" कविराज का हाथ काँप गया। "देखा कविराज यह योजना कितनी बड़ी है? चिटणीस जैसा बुद्धिमान और हमारा परमप्रिय व्यक्ति भी इस भयंकर योजना में सम्मिलित है। इसका क्या मतलब? यह हवा का झोंका नहीं तूफान है। इसे समय पर नियन्त्रित नहीं किया गया तो हम स्वयं पत्तों की तरह उड़ जाएँगे, कविराज!" "अब पन्हालगढ़ पर अधिक समय रुकना व्यर्थ है। उसी रात को वहाँ से निकलना निश्चित किया गया। लम्बी दौड़ लगाकर संभाजी और कवि कलश 286 :: सम्भाजी