छत्रपति संभाजी महाराज (धर्मवीर स्वराज्य-रक्षक एवं मुग़ल-प्रतिरोध सम्पूर्ण इतिहास)
Chhatrapati Sambhaji Maharaj Comprehensive Historical Biography
कमल गोखले / ऐतिहासिक शोध मण्डल द्वारा
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संदर्भ में पढ़ेंसुधागढ़ की दूसरी ओर पहुँचे। दो दिन की यात्रा करके उनके घोड़े घोडसे के क्षेत्र में पहुँच गये। वह भाद्रपद पूर्णिमा से पहले का दिन था। आसमान में तारे जगमगा रहे थे। हल्की हवा में सागौन पत्तों से संगीत मुखर हो रहा था। शम्भूराजा की दृष्टि सुधागढ़ की ओर गयी। वहीं पर राजद्रोहियों को रोका गया था, ऐसा उन्हें बताया गया था। घोडसा में अन्दर की ओर एक बड़े घर में शहजादा अकबर ठहरा हुआ था। शम्भूराजा घोड़े पर से कूद गये। उसी समय एक चिराग की रोशनी के साथ शहजादा और दुर्गादास राठौड़ शम्भूराजा के सामने आ गये। दोनों राजा से गले मिले। उनका हाथ पकड़कर राजा ने भावुक होकर कहा, "शहजादे और दुर्गादासजी आपके उपकार मैं कम से-कम इस जन्म में तो नहीं भूलूँगा।" "सम्भाजी महाराज आपके पिता का—शिवाजी महाराज का यह राज्य वस्तुतः सभी धर्मावलम्बियों के लिए अपना देव मन्दिर है। इसलिए यह राजस्थानी दुर्गादाम एक मुसलमान शहजादे को लेकर आश्रय के लिए आया है।'' दुर्गादाम ने कहा। "परन्तु अपनी भेंट का यह समय कितना दुर्भाग्यपूर्ण है?" लम्बी साँस लेकर सम्भाजी ने कहा, "दुर्गादास, राजस्थान और दिल्ली मे कितनी बड़ी आशा लेकर आप यहाँ मराठों के आश्रय में आये हैं। किन्तु उसी ममय हमारे राज्य के अच्छे अष्ट प्रधान अपने राजा से गद्दारी करके आपके सामने सहायता के लिए घुटने टेक रहे हैं। कितनी शर्म की बात है?" उसी जंगल में दो-तीन दरियाँ बिछाकर बैठक तैयार की गयी। दो दिनों की यात्रा से शम्भूराजा बहुत थक गये थे। सैनिकों ने उनके हाथ में नारियल का पानी दिया। राजा का ध्यान कहीं और था। वे बार बार सिर उठाकर सुधागढ़ की ओर देख रहे थे। अब चन्द्रमा आसमान के बीचोंबीच आ गया था। शम्भूराजा की बेचैनी देखकर शहजादा अकबर ने कहा, "महाराज आप चिन्ता न करें। हमने आपके गद्दार कर्मचारियों को ऊपर गढ़ पर इतनी अच्छी तरह रखा है कि वे जान ही नहीं पाएँगे कि तीर कहाँ है और सिर कहाँ?" परन्तु राजा फिर भी चिन्तित थे। उन्होंने उन दोनों से धीमी आवाज में कहा, "सुबह होने की प्रतीक्षा न करो। आधी रात को ही किसी को गढ़ पर भेज दीजिए। उनसे मीठी बातें करके सवेरा होने से पहले ही यहाँ नीचे ले आइए।" "आपकी जैसी आज्ञा, महाराज।" शहजादे ने सिर हिलाया। आधी रात को किले पर भेजे गये सिपाही नीचे उतर रहे थे। उनके हाथ की मशालें धुआँ उड़ा रही थीं। उस दल के साथ राजा ने जानबूझकर अपने पचास सैनिक भेजे थे। सैनिक नीचे उतरते हुए जोर जोर से चिल्लाने लगे—"महाराज, सम्भाजी :: 287