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छत्रपति संभाजी महाराज (धर्मवीर स्वराज्य-रक्षक एवं मुग़ल-प्रतिरोध सम्पूर्ण इतिहास)

छत्रपति संभाजी महाराज (धर्मवीर स्वराज्य-रक्षक एवं मुग़ल-प्रतिरोध सम्पूर्ण इतिहास)

Chhatrapati Sambhaji Maharaj Comprehensive Historical Biography

कमल गोखले / ऐतिहासिक शोध मण्डल द्वारा

DevanagariHindipublished793 पृष्ठ

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महाराज धोखा हो गया।'' इन शब्दों को सुनते ही शम्भुराजा और कवि कलश तुरन्त उठकर खड़े हो गये। उनकी आँखों की नींद जाने कहाँ उड़ गयी। यह सब सुनकर अकबर और दुर्गादास भी डर गये। शम्भुराजा क्रुद्ध होकर उनकी ओर देखने लगे। उनकी आँखों से आग की लपटें निकल रही थीं। सभी लोग एक साथ बताने लगे— "महाराज! धोखा हुआ। किले की दूसरी ओर भोरप्या नाले से नीचे उतरने के लिए जंगल की ओर जाने का एक रास्ता है। हमारे वहाँ पहुँचने के पहले गद्दारों ने वहाँ भाग जाने का उपाय किया होगा।" "किन्तु हमारे यहाँ आने की उन्हें खबर दी किसने?" "महाराज बाहर इतनी चटक चाँदनी छिटकी थी।" "लेकिन हम तो जंगल से होकर आये थे।" "नहीं महाराज, यहाँ पहुँचने से पहले बीच में एक कोस का खुला मैदान है न? वहाँ से हजार डेढ़ घोड़े आते हुए किसी को दिखाई नहीं पड़ेंगे क्या?" "बाबा तुम्हारी बात सच है।" सम्भाजी निराश स्वर में बोले, "अपने अण्णाजी सियार की नजर रखते हैं। बुर्ज पर से उसी बूढ़े ने आते हुए संकट को देखा होगा।"

बारह

हताश होकर शम्भुराजा अपनी जगह पर बैठ गये। उन्होंने बहुत देर तक आँखें बन्द किये ईश्वर का स्मरण किया। आगे के कार्यक्रम के लिए वे कोई आदेश ही नहीं दे रहे थे। कुछ देर के बाद शम्भुराजा ने कहा— "चलिए जो हुआ सो हुआ। वे गद्दार भागकर जाएँगे कहाँ? अण्णाजी पन्त तो पालकी के बिना चल भी नहीं सकते। बालाजी इस बुढ़ापे में घोड़े पर ठीक से बैठ नहीं सकते। केवल फर्जन्द काका ही इस उम्र में भी दौड़ सकते हैं। किन्तु षड्यन्त्रकारियों और दगाबाजों का समूह हमेशा साथ साथ रहता है। एक यदि आगे-पीछे हो गया तो दूसरों को फँसाएगा। इसलिए वे किसी को अधिक आगे पीछे नहीं होने देते। षड्यन्त्रकारियों की गति अपने आप धीमी हो जाती है। सामने सागौन के तने की तरह ऊँचे और सशक्त दिखाई पड़ने वाले अपने साथियों की ओर शम्भुराजा ने देखा। उन्होंने कहा, "जोत्याजी, रूपाजी, चलिए घोड़े दौड़ाइए। दूसरी ओर की घाटी में ही कहीं होंगे वे गद्दार। भोजन के समय 288 :: सम्भाजी