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छत्रपति संभाजी महाराज (धर्मवीर स्वराज्य-रक्षक एवं मुग़ल-प्रतिरोध सम्पूर्ण इतिहास)

छत्रपति संभाजी महाराज (धर्मवीर स्वराज्य-रक्षक एवं मुग़ल-प्रतिरोध सम्पूर्ण इतिहास)

Chhatrapati Sambhaji Maharaj Comprehensive Historical Biography

कमल गोखले / ऐतिहासिक शोध मण्डल द्वारा

DevanagariHindipublished793 पृष्ठ

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तक सारा जंगल छान मारो।'' ‘‘उन राजद्रोहियों को पेड़ों से बाँध दो और तुरन्त दूत के द्वारा यहाँ समाचार भेजो। अपने बुजुर्ग और जिम्मेदार प्रधानों द्वारा इस प्रकार का धोखा किसी भी राजा के लिए सह्य नहीं होगा। शम्भुराज ने अष्ट प्रधानों को एक बार माफ कर दिया था किन्तु उन्होंने दुबारा दगाबाजी का षड्यन्त्र किया था। शम्भुराजा को इस व्यवहार से गहरा धक्का लगा था। दुर्गादास और शहजादा अकबर जैसे लोग इतनी दूर से यहाँ आये थे। किन्तु उनके साथ बात करने की स्थिति शम्भुराजा की नही थी। उन्होंने दुर्गादास से स्पष्ट शब्दो मे कहा दिया—‘‘हम पन्द्रह दिनो के भीतर आगम से मिलेंगे, आज नहीं।''

तेरह

शम्भुराजा ने किसी तरह सवेरे स्नान किया। पूजा की। नाश्ते का समय होने के पहले ही रूपाजी और मानाजी के घोडे वापस आ गये। उन्होंने महाराज का अभिवादन किया। उनके प्रसन्न चेहरे को देखकर सम्भाजी ने सब कुछ समझ लिया। उन्होंने पूछा, ‘‘कहाँ हैं वे सब?'' ‘‘पहाड़ के पीछे की ओर। औढ के पास पकड़ा उन गद्दारों को। वहीं पर अपनी मराठी सेना की एक टुकडी है। उन्हीं की देख रेख मे उन्हें सौंपा है। आगे के लिए आदेश करें, महाराज।'' शम्भुराजा ने आसपास एकत्र हुए अपने सहयोगियों की ओर देखा। अपनी सेना के बुजुर्गों को एकत्र अलग करके बगल मे सघन छाया वाले पीपल वृक्ष के नीचे दरबार लगाया। पिता की उम्र वाले बुजुर्गों को उन्होंने हाथ जोड़कर प्रणाम किया। उस समय अनेक बुजुर्गों ने लज्जा से सिर नीचे कर लिया। शम्भुराजा ने उद्विग्न स्वर मे कहा, ‘‘एक पुराना कहावत है कि यदि राजा उदार हुआ तो हाथ पर कद्दू रख देता है। लेकिन भाइयो, इन अष्ट प्रधानो ने राजगद्दी से हमारा हक छीनकर मुझे कैद करने का हुक्म दिया था। उसके बाद भी मैंने उनके हाथों पर कद्दू नहीं रखा, उल्टे इन सभी राजद्रोहियों को मैने एक बार पुनः अष्ट प्रधानों के पद पर ससम्मान बिठाया। उनके सम्मान की रक्षा की। बताइएSS, बताइए। क्या पिछले एक वर्ष मे मेरे हाथ से कोई ऐसा कार्य हुआ, जिससे आपके शिवाजी महाराज के यश को कलंक लगे। उल्टे इन्हीं महानुभावों ने सम्भाजी 289