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छत्रपति संभाजी महाराज (धर्मवीर स्वराज्य-रक्षक एवं मुग़ल-प्रतिरोध सम्पूर्ण इतिहास)

छत्रपति संभाजी महाराज (धर्मवीर स्वराज्य-रक्षक एवं मुग़ल-प्रतिरोध सम्पूर्ण इतिहास)

Chhatrapati Sambhaji Maharaj Comprehensive Historical Biography

कमल गोखले / ऐतिहासिक शोध मण्डल द्वारा

DevanagariHindipublished793 पृष्ठ

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"औढ़ में जाइए और वहाँ जाकर हिरोजी, अण्णाजी दत्तो, उनके साथ आये सोमाजी, आवजी चिटणीस इन सभी गद्दारों को हाथी के पैर में बाँधकर उन्हें समाप्त कीजिए। केवल बालाजी की कोई हानि नहीं होनी चाहिए। उनके हाथ पैर में बेड़ियाँ डालकर तुरन्त रायगढ़ के बन्दीखाने में ले आइए।" इतना होने पर भी राजा के प्राण बालाजी में क्यों अटके हैं? यह किसी की समझ में नहीं आ रहा था। सभी लोग शंकित दृष्टि से शम्भुराजा की ओर देखने लगे। शम्भुराजा ने कुछ कहा नहीं। बहुत देर तक वे कलश की ओर देखते रहे। उनकी ओर से कोई प्रतिसाद न मिलने पर उन्होंने ऊँची आवाज में कहा, "अपने राजा की आज्ञा का पालन नहीं करना है। आप भी ऐसा निश्चय करके आये हैं क्या ?" "नहीं, नहीं, महाराज, कृपया इस प्रकार अन्यथा न समझें।" कवि कलश ने बड़ी आत्मीयता से कहा, "राजन, हमें केवल इतना कहना है कि आज आप मुझे वहाँ न भेजें। आपकी आँखों के सामने उन गद्दारों का सर्वनाश हर तरह से उचित होगा।" शम्भुराजा खिन्नता से हँसे। उन्होंने कहा, "कविराज साँझ सवेरे चौबीस घंटे आप मेरे साथ रहते हैं फिर भी आपने अपने मित्र को ठीक से पहचाना नहीं। क्या मैं ऐसा समझ लूँ? आज राजद्रोह के भयंकर अपराध में फँसे इन लोगों को मैंने बीस बीस वर्षों से मैंने अपने पिता के साथ घूमते हुए देखा है। मृत्यु के भय से थर थर काँपते उनके चेहरे देखकर मेरा मन विचलित हो गया और अपना निर्णय बदलने का विचार बन गया तो? नहीं कविराज नहीं। यदि ऐसा हुआ तो मेरा राजपद बच्चों का खेल बन जाएगा। इस प्रकार की गद्दार प्रवृत्ति को समाप्त करना है तो कठोर दंड के अतिरिक्त कोई विकल्प नहीं है।" "लेकिन, लेकिन महाराज मैं बाहर का व्यक्ति हूँ। अपने में से किसी को भेज दें। किसी मराठा या किसी ब्राह्मण को।" कविराज ने हाथ जोड़कर कहा। "कविराज अब समय बिलकुल न गँवाइए। मुझे चारों ओर गहरा अँधेरा ही दिखाई दे रहा है। इन लोगों ने राजद्रोह की हद कर दी है। ऐसे समय में स्वजनों की हत्या का कलंक इस सम्भाजी के माथे पर हमेशा के लिए लग गया तो भी कोई बात नहीं, किन्तु पिताजी और सन्तों के पुण्य से प्राप्त स्वराज्य डूब गया तो भविष्य को हम क्या उत्तर देंगे?" कवि कलश बहुत घबरा गये। उन्होंने कहा, "क्षमा करें महाराज, मेरी आत्मा कह रही है कि आप कृपा करके मुझे इस कार्य के लिए न भेजें।" "तो फिर दूसरे किसको भेजूँ? हंबीरराव यहाँ आसपास हैं नहीं। आप जैसा भरोसेमन्द आदमी कौन दूसरा है हमारे पास?" सम्भाजी २७1