भारतकोश
छत्रपति संभाजी महाराज (धर्मवीर स्वराज्य-रक्षक एवं मुग़ल-प्रतिरोध सम्पूर्ण इतिहास)

छत्रपति संभाजी महाराज (धर्मवीर स्वराज्य-रक्षक एवं मुग़ल-प्रतिरोध सम्पूर्ण इतिहास)

Chhatrapati Sambhaji Maharaj Comprehensive Historical Biography

कमल गोखले / ऐतिहासिक शोध मण्डल द्वारा

DevanagariHindipublished793 पृष्ठ

पृष्ठ 294, कुल 793 में से

संदर्भ में पढ़ें
पृष्ठ 294

“मेरे महाराज शम्भू! क्षमा करें। आप मेरी कठिनाइयाँ क्यों नहीं समझ रहे हैं?’’ बोलते-बोलते कवि कलश की आँखों में आँसू उमड़ आए। उन्होंने कहा, ‘‘राजन, इन कर्मचारियों ने पहले मुझे स्वराज्य के बुजुर्गों का विनाशक काल घोषित किया है। तन्त्रविद्या का एक महाराक्षस कहकर डुग्गी पीटी है और मुझे जन्म भर के लिए कलंकित कर दिया है। तिस पर यदि आपने पुनः इस कठोर कार्य के लिए भेजा तो यह कवि कलश जन्म-जन्मान्तर के लिए इस धरती पर एक खल पुरुष के रूप में बदनाम हो जाएगा।’’ कलश के उद्गारों को सुनकर शम्भुराजा ने एक तीखी नजर उन पर डाली। कवि कलश को राजा की ऐसी दृष्टि का सामना करने का अवसर नहीं आया था। वे घबरा गये। शम्भुराजा ने पीड़ा भरे स्वर में कहा— ‘‘कविराज, विष से भरा प्याला राजा से पहले उसके मित्र को पीना पड़ता है। एक सुप्रसिद्ध कथन को कभी भूलें नहीं कविराज— उत्सवे व्यसने चैव दुर्भिक्षे राष्ट्रविप्लवे। राजद्वारे श्मशाने च यस्तिष्ठति स बान्धवः।। ‘उत्सव व्यसन अकाल में व्यापक विप्लव काल राजद्वार श्मशान में साथ रहे सो बन्धु।’ अब रुकने का समय बिलकुल नहीं था। कविराज शम्भुराजा के सामने सिर ऊँचा करके खड़े रहे। उन्होंने राजा को बड़े आदर से अभिवादन किया। वे वहाँ से बड़ी शीघ्रता से बाहर के लिए निकले। किन्तु दरवाजे पर पहुँचकर उनके पैर रुक गये। शम्भुराजा ने रूखे स्वर में पूछा, ‘‘क्यों रुक गये? अब क्या चाहिए आपको?’’ ‘‘कल कोई प्रवाद नहीं होना चाहिए। कोई यह न कहे कि कवि कलश ही सारे अपराध का मूल कारण था या कलश ने राजाज्ञा का पालन मन से नहीं किया। ऐसा आरोप मुझे नहीं चाहिए। मेरे साथ एकाध साक्षी दें।’’ ‘‘कौन चाहिए?’’ ‘‘‘वादजी रघुनाथ देशपांडे को हमारे साथ कर दें।’’ ‘‘ठीक है। ले जाइए।’’ बीच में ही कविराज दुबारा राजा की ओर मुड़े। वे शम्भुराजा के एकदम समीप जाकर इतने धीरे से बोले कि केवल वे ही सुन सकें। ‘राजन राजद्रोह का अपराध भयंकर है ही। किन्तु अपराधी कोई साधारण व्यक्ति नहीं है। महाराज ब्रह्महत्या के पाप का कलंक आपके माथे पर जन्म-जन्मान्तर लगा रहेगा।’ ‘‘कविराज, मैं राजधर्म का पालन कर रहा हूँ। आप केवल राजाज्ञा का पालन कीजिए। बस।’’ शम्भू ने दृढ़ स्वर में कहा। 292 सम्भाजी