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छत्रपति संभाजी महाराज (धर्मवीर स्वराज्य-रक्षक एवं मुग़ल-प्रतिरोध सम्पूर्ण इतिहास)

छत्रपति संभाजी महाराज (धर्मवीर स्वराज्य-रक्षक एवं मुग़ल-प्रतिरोध सम्पूर्ण इतिहास)

Chhatrapati Sambhaji Maharaj Comprehensive Historical Biography

कमल गोखले / ऐतिहासिक शोध मण्डल द्वारा

DevanagariHindipublished793 पृष्ठ

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चौदह गढ़ के नीचे पहुँचते ही गढ़ का बुर्ज दिखने लगता हैं। उस ओर ध्यान से देखने पर लगता है कि कोई पत्थर के विराट पंखों वाला गरूड़ किले के ऊपर बैठा है। शम्भुराजा ने वहीं पर अपना घोड़ा रोक लिया। अपने सफेद घोड़े की गर्दन थपथपाते हुए वे नीचे उतरे। उनके साथ आ रहे कवि, कलश, जोत्याजी, रूपाजी और दादजी भी वहीं रुक गये। आज राजा का मन ठिकाने नहीं था। उनके सीने में काँटे जैसी चुभन हो रही थी। उन्होंने फिर से एक बार रायगढ़ के उस पाषाण पंछी पर दृष्टि डाली। वहाँ पर उदास काली छाया देखी। आसमान में बादल घिर आये थे। शम्भुराजा ने अपने साथियों से कहा, "आप लोग आगे चलें। मुझे नहीं लगता कि मैं अगले और चार दिनों तक राजधानी में आ पाऊँगा?" "लेकिन राजन आप ठहरेंगे कहाँ?" कलश ने पूछा। "यहीं दूसरी ओर जीजामाता के महल में। मेरा मन कह रहा है कि आज राजमन्दिर में ही ठहर जाएँ।" शम्भुराजा ने कहा। कवि कलश, दादजी और जोत्याजी चितदरवाजा पार करके किले पर चढ़ने लगे। शम्भुराजा का घोड़ा पाचाड़ की ओर मुड़ गया। अच्छी बातें शीघ्रता मे नहीं फैलतीं किन्तु बुरी बातों के हाथ-पैर जल्दी उग आते हैं। शम्भुराजा का घोड़ा रायगढ़ पहुँचे इससे पहले ही औढ़ा गाँव के पास घटी घटना का समाचार सभी को मिल चुका था। गढ़ के ऊपर और निचले हिस्से में सैनिक और अन्य लोग आनन्द से चिल्ला रहे थे- "षड्यन्त्रकारी मारे गये ss दुष्ट विद्रोही मर गये ss।" इस समाचार को सुनकर कुछ लोग शक्कर और मिठाइयाँ बाँट रहे थे। परन्तु उसके साथ-साथ एक भयंकर खबर भी आयी। इस खबर को सुनकर लोक अवाक् रह गये। उन्हें अपने कानों पर विश्वास नहीं हो रहा था। "बालाजी चिटणीस हाथी के पैर के नीचे कुचलकर मारे गये।" शम्भुराजा भयभीत हो गये थे। उनके मन में भान हो रहा था कि उनके यश में कलंक लग गया है। वे जब पाचाड़ के महल में पहुँचे तब षड्यन्त्रकारियों से जिन्दा बचकर आने के कारण सभी ने अपनी प्रसन्नता व्यक्त की। किन्तु यह भी सब अनुभव कर रहे थे कि कहीं तो कोई चूक हो गयी है। महल के प्रवेश द्वार पर चार हाथी झूम रहे थे। शम्भुराजा के स्वागत के लिए उन्हें सजाया गया था। छोटे-बड़े शीशे के टुकड़े जड़ा हुआ हाथियों का झुल्ल चमक रहा था किन्तु शम्भुराजा की सम्भाजी : 293