छत्रपति संभाजी महाराज (धर्मवीर स्वराज्य-रक्षक एवं मुग़ल-प्रतिरोध सम्पूर्ण इतिहास)
Chhatrapati Sambhaji Maharaj Comprehensive Historical Biography
कमल गोखले / ऐतिहासिक शोध मण्डल द्वारा
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संदर्भ में पढ़ेंचलता बोलता विशाल नगर था। मार्ग में एक छोटी-सी नदी के किनारे अस्थायी रूप से छाया करने के लिए एक छोटा-सा शाही तम्बू खड़ा किया गया था। उसमें औरंगजेब दोपहर का विश्राम कर रहा था। बादशाह की उम्र तिरसठ वर्ष की थी। राज्य का कार्यभार सँभालने के बाद उन्होंने पिछले तीस-पैंतीस वर्षों में कभी भी अपना स्वास्थ्य बिगड़ने नहीं दिया था। उनका शरीर सागौन वृक्ष के तने की तरह सीधा और बलवान था। उनकी आँखें तीक्ष्ण, भेदक एवं देखते समय किसी पर भी अपना प्रभाव छोड़ने वाली थीं। साथ ही फौज आगे-पीछे चल रही थी। सेना की अनेक टुकड़ियाँ जहाँ कहीं भी छाया मिली वहाँ विश्राम कर रही थीं। बादशाह के उस लाल तम्बू में इस समय उनके मुख्य काजी अब्दुल वहाब और वजीर असदखान जैसे कुछ प्रमुख लोग ही थे। शाहंशाह की प्रशंसा करते हुए असदखान ने कहा, "जहाँपनाह, आज आपकी शाही हुकूमत काबुल से लेकर बंगाल, आसाम तक, नीचे बुरहानपुर खानेदेश तक है। आपने बहुत बड़ा साम्राज्य अपनी मुट्ठी में कर लिया है। आज किसी में भी ऐसी हिम्मत बची नहीं है कि आपके सामने सिर ऊँचा कर सके। आप दुनिया के बड़े से बड़े बादशाहों में एक हैं। आप इस संसार में सबसे अधिक ताकतवर हैं।" काजी साहब ने पूछा, "जहाँपनाह आपकी इस दक्षिण मुहिम को कितना समय लगेगा?" औरंगजेब कुछ गम्भीर होते हुए बोला, "आप नहीं जानते इस मुहिम को। दक्षिण का प्रदेश इतना आसान नहीं है। सम्राट अकबर भी दक्षिण का प्रदेश जीतने में कामयाब नहीं हो पाये थे। हमारे अब्बाजान शाहजहान भी बड़ी मुश्किल से अहमदनगर की निजामशाही को जीत पाये थे। गोलकुंडा और बीजा की शिया मुसलमानों की रियासतें मरगट्टों का महाराष्ट्र काँटों का प्रदेश है। इसे जीतना इतना आसान नहीं है।" इसके पहले इतनी बड़ी पाँच छः लाख की फौज लेकर औरंगजेब ही नहीं दिल्ली का कोई भी बादशाह बाहर नहीं निकला था। औरंगजेब जब अपने तम्बू में बैठता था, उस समय लगभग तीन लाख घोड़े, दो लाख पैदल सेना, दृष्टि की सीमा में न समाने वाले आदमी और जानवर देखकर उसका सीना अभिमान से भर जाता था। अपनी इस शान-शौकत और विराट सेना के प्रभाव से दहशत फैल जानी चाहिए। ऐसा औरंगजेब सोचता था। गोलकुंडा और बीजापुर के दरबार को तो डोर टूटी पतंग की तरह कहीं से कहीं फेंका जा सकता है। अपने आने और सेना के इस महासागर की खबर सुनकर उस काफिर के बच्चे सम्भा की डर से छाती फट जानी चाहिए। फिर भी दक्षिण देश की इस मिट्टी का ठीक ठीक अनुमान लगाना कठिन ३०4 सम्भाजी