भारतकोश
छत्रपति संभाजी महाराज (धर्मवीर स्वराज्य-रक्षक एवं मुग़ल-प्रतिरोध सम्पूर्ण इतिहास)

छत्रपति संभाजी महाराज (धर्मवीर स्वराज्य-रक्षक एवं मुग़ल-प्रतिरोध सम्पूर्ण इतिहास)

Chhatrapati Sambhaji Maharaj Comprehensive Historical Biography

कमल गोखले / ऐतिहासिक शोध मण्डल द्वारा

DevanagariHindipublished793 पृष्ठ

पृष्ठ 308, कुल 793 में से

संदर्भ में पढ़ें
पृष्ठ 308

“शहजादे की बर्बादी का ज़िम्मेदार वह मक्कार दुर्गादास है। दुर्गादास जैसा इस्लाम का दुश्मन मैंने जिन्दगी में नहीं देखा।” औरंगजेब की आँखों के आगे उनकी पिछली जिन्दगी का चित्र उभर रहा था। जिस समय वह अपनी उम्र का मात्र अठारहवाँ सोपान कर रहा था उसी समय बादशाह शाहजहाँ ने उसे दक्षिण की सूबेदारी का जरीदार लिबास पहना दिया था। परन्तु उस उम्र में भी औरंगजेब को अपने पिता की साजिश का पता चल गया था। राजधानी के तख्त, ताज और खजाने की संगति छोड़कर कौन शहजादा दक्षिण के जंगलों में जाना पसन्द करेगा? शाहंशाह शाहजहाँ ने तरुण औरंगजेब की महत्त्वाकांक्षाओं को जान चुका था। शाहजहाँ को इस बात का अनुमान लग गया था कि धीर-गम्भीर, कम बोलने वाला, हमेशा सावधान, संयमी, अपने पेट का पानी न हिलने देने वाला साहसी औरंगजेब किसी दिन संकट उत्पन्न कर सकता है। प्रिय शहजादे दाराशिकोह के रास्ते का रोड़ा बन सकता है। इसीलिए इस वृक्ष को स्वतन्त्र रूप से बढ़ने नहीं देना है। उसकी महत्त्वाकांक्षा की जड़ें राजमहल की दीवारों के भीतर घुसें, इससे पहले ही उन्हें उखाड़ फेंकने का निर्णय शाहजहाँ ने किया। किन्तु जिस पेड़ की जड़ें मजबूत होती हैं उसे उखाड़कर फेंक देने पर भी वह फिर से खड़ा हो जाता है और फैलने लगता है। इसी नीति के अनुसार औरंगजेब ने भी दक्षिण में अपने पैर जमा लिए। बागलान और आवसा जैसे प्रदेशों को उसने अपने अधिकार में कर लिया। उदगीर का क्षेत्र भी उसने अपने राज्य में मिला लिया। मलिक अंबर ने खड़की नाम के नगर को बसाकर विकसित किया था। उसे औरंगजेब ने औरंगाबाद नाम देकर विकसित किया। आगे उसने गोलकुंडा को जीतकर बीजापुर पर आक्रमण करने और उसे अपने अधिकार में लेने की तैयारी की थी। उसे विश्वास था कि वहाँ के शियापन्थी मुसलमानों का तख्त उलट देने से उसे पिता की ओर से इनाम मिलेगा। किन्तु ऐन मौके पर दारा ने हस्तक्षेप किया। औरंगजेब की महत्त्वाकांक्षा के घोड़े को पकड़कर रोक दिया। दारा ने सोचा कि दो समृद्ध राज्य नहीं भी मिले तो कोई बात नहीं किन्तु औरंगजेब को इस तरह बढ़ने देना ठीक नहीं। कुछ समय बाद शाहजहाँ बीमार पड़ गया। उसके चारों शहजादों में सम्पत्ति के उत्तराधिकार के लिए झगड़ा आरम्भ हो गया। इसी समय अपना दक्षिण का काम छोड़कर औरंगजेब दिल्ली चला गया था। दिल्ली आते समय उसके मन में एक ही भय उठ रहा था। महाराष्ट्र के पठार पर शिवाजी के रूप में एक विद्रोही रहता था। औरंगजेब की दृष्टि में शिवाजी कोई राजा वाजा नहीं थे। वे केवल एक निकृष्ट जमींदार थे। बुरहानपुर की सीमा को पार कर आगे जाते हुए औरंगजेब ने वहाँ के 306 :: सम्भाजी