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छत्रपति संभाजी महाराज (धर्मवीर स्वराज्य-रक्षक एवं मुग़ल-प्रतिरोध सम्पूर्ण इतिहास)

छत्रपति संभाजी महाराज (धर्मवीर स्वराज्य-रक्षक एवं मुग़ल-प्रतिरोध सम्पूर्ण इतिहास)

Chhatrapati Sambhaji Maharaj Comprehensive Historical Biography

कमल गोखले / ऐतिहासिक शोध मण्डल द्वारा

DevanagariHindipublished793 पृष्ठ

पृष्ठ 309, कुल 793 में से

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पृष्ठ 309

थानेदार को शिवाजी का नाम लेकर ताकीद दी थी—"इस विद्रोही जमींदार पर कड़ी नजर रखो। उसे बड़ी मस्ती चढ़ रही है।" दोपहर के उस विश्रान्ति क्षण में बादशाह को सम्भाजी के साथ शिवाजी की भी याद आयी। उत्तर में उत्तराधिकार के लिए युद्ध, उसके बाद काबुल कंधहार से लेकर बिहार बंगाल तक की मुहिम, राज्य कर्मचारियों के व्यवस्थित कार्य व्यापार सुदृढ़ करने जैसे कार्यों में हम बीच-पचीस वर्ष उत्तर में ही अटके रहे। इसी का नाजायज फायदा शिवाजी ने उठाया। अपने मामा साहब शाइस्ता खान पर आक्रमण करके उसने उनकी उंगलियाँ तोड़ दीं। अपनी सूरत जैसी समृद्ध नगरी को दो बार लूटा। ये सारी बातें औरंगजेब को याद आयीं। किन्तु शिवाजी से आगरा में हुई भेंट को स्मरण करते ही औरंगजेब व्यथित हो गया। अपने भीतर के असह्य दुख को व्यक्त करते हुए औरंगजेब बोल पड़ा— "पुरन्दर की घटना के बाद मैंने शिवाजी को आगरा आने के लिए मजबूर किया था। किन्तु मनुष्य के हाथ कभी-कभी ऐसी चूक हो जाती है कि जिन्दगी भर उसका अफसोस करने के अलावा कुछ बचता ही नहीं।" "जहाँपनाह? " असदखान और काजी साहब घबराकर बादशाह की ओर देखने लगे। "उस शिवाजी और उसके इस सम्भाजी नाम के बच्चे को काबुल और कंधहार की मुहिम पर भेजने का मैंने पक्का निश्चय कर लिया था। मरगट्टों की इस जमीन से दूर किसी अनाम जंगल में धोखे से इन बाप-बेटे का हमें कत्ल करना था। उसी समय यदि शिवाजी समाप्त हो गया होता तो उसकी हुकूमत और मराठों की मूर्खता भी उसी समय समाप्त हो गयी होती। लेकिन अफसोस। हमने असावधानी उन्हें वहाँ भेजने में देरी कर दी और आज तक पश्चाताप कर रहे हैं। इतनी-सी भूल की कितनी बड़ी सजा।" बीच में ही साहस बटोरकर फौलादखान ने पूछा, "गुस्ताख़ी माफ़ जहाँपनाह मुझे ऐसा लगता है कि आगरा से शिवाजी जिस समय भाग गये वही आपकी जिन्दगी का सबसे अधिक शर्मनाक और दुखद दिन है?" "नहीं, वह दिन नहीं। हिन्दुस्तान का कोई भी राजा मरा या मारा गया तो उसे हम अल्लाह की कृपा मानकर खुशी से पागल हो जाते हैं। किन्तु एक दिन हम इसी तरह दरबार में बैठे थे कि हरकारे ने हमारी जिन्दगी की सबसे बुरी खबर दी थी।" "कौन-सी? जहाँपनाह!" "काशी से ब्राह्मण को बुलाकर शिवाजी ने अपना राज्याभिषेक कराया और उसका उत्सव मनाया। यह हमारी ज़िन्दगी की सबसे ज्यादा शर्मनाक और दुखद ख़बर थी। यह हमारी ज़िन्दगी का सबसे ज्यादा शर्मनाक दिन था।" सम्भाजी 307

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