छत्रपति संभाजी महाराज (धर्मवीर स्वराज्य-रक्षक एवं मुग़ल-प्रतिरोध सम्पूर्ण इतिहास)
Chhatrapati Sambhaji Maharaj Comprehensive Historical Biography
कमल गोखले / ऐतिहासिक शोध मण्डल द्वारा
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संदर्भ में पढ़ेंएक दीपस्तम्भ था। फौज में शाहंशाह का ठिकाना कहाँ है? यह उस दीपस्तम्भ से किसी को भी ज्ञात हो सकता था। उस ऊँची पहाड़ी और दूसरी ओर की घाटी में अँधेरा फैल गया। नित्य की भाँति फौज में अनुशासनबद्ध रीति से अपने डेरे डाल दिये। बादशाह ने अपने सहयोगियों के साथ नमाज पढ़ी। अपने अमीरों के साथ कुछ महत्त्वपूर्ण विषयों पर विचार विमर्श किया। उसके बाद वह अपनी गुलाबबारी की ओर लौट गया। बादशाह ने आज अपने शहजादों और सेना के अपने नजदीकी मेहमानों के लिए एक बड़ा भोज आयोजित किया था। इसलिए बादशाह के अपने खास लोगों के लिए आज की रात बहुत महत्त्वपूर्ण थी। इस बड़े भोज के लिए उस विशिष्ट तम्बू बेगम उदयपुरी के साथ सभी खास खास स्त्रियाँ एकत्र हुईं। उनके पीछे बादशाह का बड़ा शहजादा मुअज्जम, वैसे ही कामबख्श और मुअद्दीन के साथ बादशाह के सभी पौत्र एकत्र हुए। बादशाह के परिवार के लोगों के आने पर बादशाह के अन्य मेहमान और सरदार बड़े अदब से खड़े हो रहे थे। उनमें बादशाह के पीछे नित्य खड़ा रहने वाला, औरंगजेब से उम्र में बड़ा हट्टा कट्टा असदखान था। उसकी बगल में औगंगजेब का मौसेरा भाई, असदखान का बेटा जुल्फिकार खान बैठा था। सेना के अत्यन्त महत्त्वपूर्ण पदों पर काम करने वाले बादशाह के मेहमान थे। उन्हें महत्त्वपूर्ण स्थान दिया गया था। आज का भोज शाही मेहमानों के लिए एक आश्चर्यजनक चीज थी। अन्य समयों पर अपने राजनीतिक शतरंज की चौपड़ और नमाज की चादर को छोड़कर बादशाह किसी की ओर भूलकर भी नहीं ताकता था। उसकी हास्य विनोद और संगीत में भी कोई रुचि नहीं थी। बादशाह का सेना में, दरबार में, अन्य कार्य व्यापार में बड़ा दबदबा था। अन्य मेहमानों और अधिकारियों की बात तो दूर, शहजादा आजम और मुअज्जम भी अपने पिता से आये पत्र को पढ़ते हुए थर थर काँपने लगते थे। उनके चेहरे भय से ऐसे सफेद हो जाते थे जैसे किसी ने खड़िया या मिट्टी पोत दी हो। इसलिए ऐसे बादशाह के साथ भोजन करने में भी सभी मेहमान भीतर से बहुत डरे हुए थे। वे अल्लाहताला से दुआ कर रहे थे कि खुदा की मेहरबानी से उनके द्वारा कोई गुस्ताखी न हो जाये और यहाँ से वे सकुशल छुट्टी पाएँ। इसी बीच औरंगजेब की दुबली-पतली, बुढ़ापे से कमजोर किन्तु किसी बालक के उत्साह से भरी मूर्ति वहाँ उपस्थित हुई। सभी की कोर्निस को स्वीकार करते हुए बादशाह ऊँचे आसन पर बैठ गया। बादशाह के पीछे-पीछे उसकी पैंतीस वर्षीय लाड़ली शहजादी जीनतउन्निसा चल रही थी। जैबुन्निसा औरंगजेब की बड़ी बेटी थी और यदि सच कहा जाये तो उसने बादशाह का दिल जीत लिया था। किन्तु शहजादे अकबर को बगावत के समय उसने छुपकर उसकी सहायता की थी। यह सम्भाजी :: 311