छत्रपति संभाजी महाराज (धर्मवीर स्वराज्य-रक्षक एवं मुग़ल-प्रतिरोध सम्पूर्ण इतिहास)
Chhatrapati Sambhaji Maharaj Comprehensive Historical Biography
कमल गोखले / ऐतिहासिक शोध मण्डल द्वारा
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संदर्भ में पढ़ेंसीमा। भौगोलिक क्षेत्र और आर्थिक समृद्धि की दृष्टि औरंगजेब का एक प्रदेश मराठों के स्वराज्य से दुगुना तिगुना बड़ा था। औरंगजेब के पास ऐसे बाइस प्रदेश थे। दक्षिण की ओर चल रहे बादशाह को अपनी कुशलता और अपनी सेना की बहादुरी पर पूरा विश्वास था। इसके अतिरिक्त औरंगजेब को रात दिन आतंकित करने वाले शिवाजी अब नहीं थे। पिछले डेढ़ वर्षों से स्वराज्य सम्भाजी के अधिकार में आ गया था। तब से गृह कलह बहुत बढ़ गया था। अनेक मराठा और ब्राह्मण वतनदारों ने दिल्ली के बादशाह को पत्र भेजे थे—"आलमपनाह आप साक्षात पृथ्वीपति हैं। जल्दी से जल्दी दिल्ली से दक्षिण आएँ, उस दुष्ट सम्भाजी और उसके जुल्मी स्वराज्य से हमें मुक्त करें। हमारे वतन के सारे कागजात हमारी झोली में डाल दें।" इस ठोस पार्श्वभूमि पर सम्भाजी जैसे एक क्षुद्र, मामूली ग्रामीण विद्रोही को तो सहज ही कुचल देंगे। ऐसा बादशाह को दृढ़ विश्वास था। वह इसी बेहोशी में अभिमान से चारों ओर देख रहा था। अपनी चतुरंगिणी सेना को बड़े गर्व से देख रहा था। संध्या का समय हो रहा था। शाही फौज के साथ मुकाम के लिए सामान की दुहरी व्यवस्था थी। आज भी बादशाह के मुकाम पर पहुँचने के पहले ही कामगारों ने डेरे डंडे खड़े कर दिये थे। पहाड़ी पर सबसे ऊँची जगह देखकर बादशाह, उनके शहजादों और जनानियों के लिए व्यवस्था की गयी थी। वहाँ पर बादशाह का अत्यन्त आकर्षक, लाल रंग का, मछलीपट्टनम के कपड़े का तम्बू खड़ा किया गया था। बगल में बेगम और शहजादों के लिए तम्बू लगाए गये थे। इस हिस्से को 'गुलालबार' कहा जाता था। बादशाह के डेरे के बाहर तोपखाने की एक प्रचंड सेना पहरा देने के लिए खड़ी थी। वहाँ पर रोज एक नया सरदार पहरा देने के लिए नियुक्त होता था। बादशाह के तम्बू के आगे एक बड़ा गुस्लखाना और दूसरा कोतवाली का तम्बू खड़ा किया गया था। गले में सोने का घंटा बाँधे और अनेक रूपों से सजाए हुए एक हाथी को लाल तम्बू के सामने महावत ने बैठाया। उसी समय चाँदी की एक लम्बी सीढ़ी लेकर कुछ परिचारक आगे दौड़े। अपना एक एक पैर सीढ़ी के डंडों पर रखते हुए बड़ी शान से बादशाह हाथी से नीचे उतरे। बादशाह ने अपने तम्बू के सामने खड़ा किया गया एक ऊँचा खम्भा देखा। पश्चिम में सूर्य के पहाड़ की ओट में मुँह छिपाने के पहले ही बादशाह के तम्बू के सामने के खम्भे पर चिराग जला दिया गया था। समुद्र में राह से भटके नाविकों के लिए जिस प्रकार आकाशदीप का दीपस्तम्भ होता है उसी प्रकार लगभग तीस मील में फैली बादशाह की फौज के लिए यह आकाशदीप ३१० सम्भाजी