छत्रपति संभाजी महाराज (धर्मवीर स्वराज्य-रक्षक एवं मुग़ल-प्रतिरोध सम्पूर्ण इतिहास)
Chhatrapati Sambhaji Maharaj Comprehensive Historical Biography
कमल गोखले / ऐतिहासिक शोध मण्डल द्वारा
पृष्ठ 317, कुल 793 में से
संदर्भ में पढ़ेंसोने के गहनों से लदी रहने वाली महारानी सोयराबाई का आज का रूप ही एकदम अलग था। सफेद वस्त्र, माथे पर पड़ी झुर्रियाँ, सूखते कुएँ जैसी गहरी आँखें एकदम दुर्बल शरीर। सोयराबाई अनेक वर्षों तक तपस्या करने वाली सन्यासियों सी लग रही थीं। उनकी आवाज भी बहुत पतली हो गयी थी। उन्होंने अपने भाई को बगल के पलँग पर बैठने को कहा। हंबीरराव अपने को रोक न सके उन्होंने कहा, "माफ क र न । दीदी जी, कारण जो भी हो आपका छोटा भाई आपके साथ नहीं रह सका। मुझे माफ करें।" "हंबीरराव वैसी कोई बात नहीं है। यह सच है कि आरम्भ में तुम्हारे ऊपर मुझे बहुत क्रोध आया था। किन्तु बीती बातों पर गम्भीरता से विचार किया। सारी घटना को तटस्थता से देखा। उसके बाद निश्चित किया कि तुम्हें शाबाशी देनी चाहिए।" "दीदीजी, आप क्या कह रही हैं?" हंबीरराव की आवाज भर आयी। उन्होंने कहा, "राजाराम के विवाह के पहले की बात है। उस समय बड़े महाराज ने एकान्त में मुझसे कहा था-राजाराम आप मेरे साले हैं। किन्तु यह मात्र संयोग है। उस रिश्ते के आधार पर मैंने आपको सेनापति का पद नहीं दिया। इसके विपरीत हमारा यह विश्वास है कि आपके मजबूत हाथों में स्वराज्य का संवर्धन होगा।" "सच है हंबीरराव। महाराज गुणों के सच्चे पारखी थे।" बहुत दिनों के बाद इस प्रकार खुले मन से बातें हो रही थीं। इसीलिए अपने मन को मुक्त करते हुए हंबीरराव ने कहा "महाराज और शम्भुराजा की पन्हाला पर हुई भेंट के बाद महाराज ने मुझसे स्पष्ट शब्दों में कहा था-शम्भुराजा से जो हमारी बात हुई उसमें मैंने शम्भू के मन को अच्छी तरह पढ़ा। मुझे विश्वास हो गया है कि स्वराज्य शम्भुराजा के हाथों में ही सुरक्षित रहेगा। राजाराम अभी अबोध है।" "ऐसा है?" सोयराबाई गम्भीर हो गयीं। रायगढ़ पर उत्तराधिकार के लिए हुए पहले विद्रोह की हंबीरराव को याद आयी। उन्होंने कहा, "दीदी। उस सारी पार्श्व भूमि के सम्बन्ध में मैं आपसे इतना ही कहूँगा कि हो सकता है कि एक भाई ने अपनी बहन का साथ न दिया हो या धोखा दिया हो किन्तु स्वराज्य के एक ईमानदार सेवक ने खाये हुए नमक का अदा किया है, यह निश्चित है।" सोयराबाई ने शून्य में देखते हुए कहा, "हंबीरराव जब हम राजगढ़ में रहते थे तब सईबाई के बाद मैंने शम्भू को अपने पेट के बच्चे की तरह पाला पोसा। बाद में राजाराम हमारी गोद में आये। उसके बाद शम्भुराजा को हमने कब अलग कर सम्भाजी ३१८